Monday, 29 April 2013

रहना साथ मेरे !!




कोई सपना है या हकीक़त
समझी नहीं अब तक,
प्यार का मौसम है तो सुहाना,
पर आज क्यूँ लगा ये बेमाना।

कली खिली थी जो मद्धम सी रोशिनी में,
थोड़ा सहम गयी वो तपाती धूप में
जलना तपना कब आसान हुआ भला,
तेरे होने ना होने में भीकैसे मुझे आराम ही मिला।  

कहने लगी मुझसे येअपना हौंसला न छोड़ो
सांसो कि लौ से हवाओं का रुख मोड़ो।

अक्सर इस राह पर
कांटे लिखे हैं आने
हाथ थामे रखनाकिस पल कमजोर पड़ जाऊंकौन जाने।
फिर भी मंजिल मिल ही जाएगीतुम जो हो साथ मेरे,
दुआ है पूरे हों सब सपने तेरे-मेरे, हमारे।



- आरोही
 

सुबह मेरी !!

     

घर की सुबह थी कितनी सुहानी,
बहुत याद आती है पुरानी कहानी। 

माँ का आते ही आवाज़ लगाना,
और हमारा मुहँ-कान ढक कर सो जाना। 
फिर वो धीरे से पकड़ती थी कान हमारे,
और हम कहते कि माँ , थोड़ा और सोने दो ना। 

देखो वो है सोया , उसको पहले जगाओ, 
यूँ कह कहकर करते बहाना,
फिर आधी आँखें खोल करते हम जागने का दिखावा। 

“जो जागेगा पहले , मिलेगी उसको प्रशाद कि बर्फी” , माँ कहती ऐसा,
और छलांग लगाकर दोनों का जग जाना, 
मुझे पहले मुझे पहले , मुझे कम... क्यूँ उसे ज्यादा ....
माँ कि ट्रिक हमेशा चल जाती थी,
मेरी हर सुबह ऐसे ही खिलती थी।

अब वो मौसम ही कहाँ, 
इस नयी जगह, नये जहाँ,
सब बदल गया जैसे, 
ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग....अब फ़ोन का अलार्म उठाता है ऐसे। 


- आरोही