कोई सपना है या हकीक़त,
समझी नहीं अब तक,
प्यार का मौसम है तो सुहाना,
पर आज क्यूँ लगा ये बेमाना।
थोड़ा सहम गयी वो तपाती धूप में,
जलना तपना कब आसान हुआ भला,
तेरे होने ना होने में भी, कैसे मुझे आराम ही मिला।
कहने लगी मुझसे ये, अपना हौंसला न छोड़ो,
सांसो कि लौ से हवाओं का रुख मोड़ो।
अक्सर इस राह पर, कांटे लिखे हैं आने,
हाथ थामे रखना, किस पल कमजोर पड़ जाऊं, कौन जाने।
दुआ है पूरे हों सब सपने तेरे-मेरे, हमारे।
- आरोही

