Monday, 29 April 2013

रहना साथ मेरे !!




कोई सपना है या हकीक़त
समझी नहीं अब तक,
प्यार का मौसम है तो सुहाना,
पर आज क्यूँ लगा ये बेमाना।

कली खिली थी जो मद्धम सी रोशिनी में,
थोड़ा सहम गयी वो तपाती धूप में
जलना तपना कब आसान हुआ भला,
तेरे होने ना होने में भीकैसे मुझे आराम ही मिला।  

कहने लगी मुझसे येअपना हौंसला न छोड़ो
सांसो कि लौ से हवाओं का रुख मोड़ो।

अक्सर इस राह पर
कांटे लिखे हैं आने
हाथ थामे रखनाकिस पल कमजोर पड़ जाऊंकौन जाने।
फिर भी मंजिल मिल ही जाएगीतुम जो हो साथ मेरे,
दुआ है पूरे हों सब सपने तेरे-मेरे, हमारे।



- आरोही
 

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