Sunday, 2 March 2014

अनोखा उपहार !!

“अरे सीमा ! मत जा उधर, कहीं मेज पर रखीं स्याही न उड़ेल देना, तेरे पीछे भाग सकूँ इतनी हिम्मत नहीं रही अब मुझमें; सीमा भी रुआंसा सी हो रुक गयी, कि ऐसा क्या लिखते रहते हो इन पन्नों में, कुछ बताते भी नहीं?” काका ने हँसते हुए उसे गोदी में बिठा लिया, “रे मेरी शरारती बच्ची, जब मेरी छोटी सी गुड़िया दुल्हन के जोड़े में सज किसी और नगरी जाएगी ना तबके लिए है ये सब |” समय के साथ सीमा भी ये सब बातें भूल गयी, पर आज जब दुलहन के जोड़े में सजी बैठी थी काका की गुड़िया तो अनायास ही हर ओझिल हुआ दृश्य समक्ष ही बनने लगा | ये वही काका, जिन्होंने बचपन से लेकर बड़े होने तक कामकाजी माता-पिता की कमी महसूस ही न होने दी उसे | तभी दरवाजे पर कोई आहट हुई, करीने से झाँका तो हाथ में कुछ खतों को समेटे वही काका खड़े थे | सीमा की खुशी का कोई छोर ही न हो जैसे | प्यार से अपनी नन्ही को दुलारते, उसकी ओर उस अलबेली सौगात को बढ़ा दिया, “अपने काका की सीख समझ के रख लेना इन खतों को, हर अच्छे बुरे समय कि परिकल्पना से ही जो नन्ही पारी डर जाती थी न, उसे अब कैसे एक नये परिवार को सम्भालना है, कैसे एक नया जहाँ बनाना है, सब तेरे स्वभावानुसार लिखने की कोशिश की है मैंने | ” तेरा गरीब काका बस इतना ही कर सका | सीमा के बहते आंसू थम ही न रहे थे कि कैसे गणना करे इस अमूल्य उपहार की |
-आरोही

2 comments:

  1. बहुत ही भावप्रधान लेखनी ..

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  2. बेहतरीन उपहार....आखिर "तेरा गरीब काका और क्या दे सकता".... पूरी कहानी का मर्म लपेटे यह लाइन।

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