तेज़ तेज़ क़दमों से रास्ता पार करने की जद्दोजेहत, सिर पर खड़ा सूरज वो तपतपाती धूप, दोनों पांव किसी हौड़ में भाग लेते हुए, मानो रास्ता चुटकियों में पार कर लेना चाहते हों I दूर दूर तक कोई पंछी भी नज़र न आये, हाय... ऐसी हालत थी गर्मी के कारण, उसपर ये सुनसान रास्ता I अपने ही ख्यालों में खोयी कहीं ... दिन भर जो अटपटा रहा सो रहा, उसपर अम्मा के नखरों से बड़ती बेफ़जूल की सिरदर्दी, कभी ये करो कभी न करो, इसी उधेड़बुन में पेड़ों से सटा रास्ता कब पार कर गयी पता ही न चला I अब अपने गाँव की मंडेर नज़र आने लगी थी, राहत की साँस ली मैंने I
ऐसे ही आते-जाते बुनते-उधड़ते विचारों के बीच किसी मद्धम सी रौशनी ने दस्तक दी हो जैसे ....कुछ दूरी पर किसी की बनती उभरती आकृति नजर आई I पास आते-आते उसका वो गहरे नीले रंग का सूट, थके मांदे से बड़ते कदम, और सिर पर लादी घास फूंस से भरी गठरी I गेंहुए रंग का झुर्रियों से भरा चेहरा और माथे पर पड़ते शिकन के बीच मेहनत मानो ओंस की बूँद जैसे चमक रही हो I उसकी थकान, उसका चेहरा और उसके शिथिल पड़ते पांव स्पष्ट ब्यान कर रहे थे I उसकी ऐसी हालत देखकर, अकस्मात ही ये ख्याल हो आया की भला इतना बोझा सिर पर लादने की ज़रूरत क्या है, कोई ठेला लेलेती तो कितना आसान हो जाता I ऐसा विचार भला आये भी क्यूँ न, हम चाहे अपनी कितनी इधर-उधर की बातों का बोझ हररोज़ ढोते फिरें, पर औरों को देख अपनी राय बनाने में कहाँ सकुचाते हैं, तब तो जैसे विद्वान पंडित हम स्वयं हों गये हों I
फिर तभी मेरे देखते ही देखते वो गठरी उसके सिर से लुढ़क गयी और थोड़ी दूर जाकर गिरी I उसने एक दो बार चेष्टा की उठाने की पर कर नही पाई I क्या पता अपनी सखी-सहेलियों से ही रखवाती हो चलने से पहले भी I मैं उसकी ओर देखती हुई निकलने की कोशिश कर रही थी, पर छोटे-छोटे कदम लेती जाने क्यूँ थम सी गयी वहीँ I उसकी बड़ी-बड़ी काले घेरों से सटी आँखें एकटक कभी मुझे देखती तो कभी गठरी को ....जैसे कुछ कहना चाह रही हों I असहाय-सी न वो मुझे आवाज़ दे पाई और न मैं ही खुद कुछ पूछने की हिम्मत जुटा पायी.... बड़े-छोटे लोगों का भेद जो बना रखा है हमने I इसी तरह दो कदम आगे ले लिये, पर न जाने क्यूँ एक बार पीछे मुडकर देखा, और पाया कि वो अब भी मुझे ही देख रही थी बड़ी आशा से I मैं बढ़ न सकी, वो वहीँ पीछे खड़ी हुई आवाज़ लगाते हुई पूछती, “मेमसाब जरा हाथ लगवा दो, ये गठरी उठाना आसान हो जायेगा I” मैं भी बिना कुछ सोचे- समझे मुड़ गयी उसकी ओर, जैसे उसकी पुकार की ही बाट जो रही थी I या यूँ कहूँ कि किसी दूर बसे एहम की पूर्ति हो गयी थी I मैंने जैसे ही नीचे गिरी गठरी को उठाने की कोशिश की, बाप रे कितनी भारी I कहने को घास फूस था उसमें, पर भार लोहे जैसा; ये अकेली भला इतनी दूर इसे सम्भालती कैसे होगी, भगवान जाने I मेरे लिए तो रोजमर्रा के काम ही सिरदर्द हो जाते हैं और ये अधेड़ उम्र की औरत....कितना मुश्किल है ताउम्र ऐसा जीवन जीना I एक रहीस आदमी जो पत्थर पड़े फ़र्श पर भी कालीन बिछा कर पाँव रखता है वो कितना छोटा समझता है इन्हें I पर सच है कितना अलग I
यही सब सोचते-सोचते..... मेरे थोड़ा-सा सहारा देने से उसने वो गठरी सिर पर उठा ली और मेरा शुक्रिया अदा कर अपने रस्ते चल पड़ी I मैं भी अपने गाँव की ओर कदम दर कदम बढाने लगी I पर आज उस अधेड़ उम्र की औरत से मिलकर ना जाने कितने सवाल मेरे ज़हन में तैरने लगे थे, जवाबों और अर्थों की प्रतीक्षा में I
- आरोही
- आरोही
जिस विषय पर आपने लिखा है वो सभी के आंखों से हो कर गुजरता है! पर , अभी तक आप्रकाशित था! आपकी लेखनी को पढा तो लगा सब कुछ चलचित्र सा चल रहा है! उस बूढी दुखायरी का आपकी और देखना कुछ ऐसा लगा जैसे मुझे देख रही है!
ReplyDeleteहम अपने दिनचर्या में ऐसे कितने ही लोगों को देख लेते और फिर व्यस्त हो जाते हैं। लेकिन लेखक वही जो उन भावों को उकेर के उन्हे अभिव्यक्ती सूत्र से बान्ध देते हैं।
इसलिये आपके इस लेखन को में सार्थक सृजन कहूँगा !
बहुत प्रतिभा है आपके अन्दर .. बस लिखती रहिये !
सादर नमन इस अभिव्यक्ती को
सादर !
अनुराग त्रिवेदी - एहसास
आरोही सुंदर चित्रण .... एक एक पहलू को कितने बेहतरीन तरीके से उकेरा है .....
ReplyDeleteवाह....
सच मे आखिर "रह जाते है कुछ सवाल" जिंका जवाब देना शायद अपने बस मे नहीं या यूं कहे की हम उसे तवज्जो देते नहीं