दिन, तारीखें, बातें, यादें
भला कैसे याद ना रहे
हर ख़ास दिन तेरा तुझसे जुड़ा
भूलूं , कहो कैसे जो सब तुझमें गुंधा हो मेरा
कुछ आदत सी हैं इन आते-जाते
छोटे-छोटे लम्हों को समेटकर रखने की
उसी गोल-मटोल संदूक में
जिसके बस होने भर से
हर कोने में
वही महक बसा करती है
जो उभरी थी कली-सी खिलकर
उस रोज़ जब तुमने दस्तक दी थी
पहली बार मन में मेरे
लय भरी थी इस जीने में |
आज फिर जब हौले से हाथ फेरा
उन सहेजी हुई यादों पर
वही एहसास, वही ख़ुशी
जैसे कहीं झूम रही हो ये रूह
फूलों की बरखा में
झरोकों से गुजरती मद्धम सी रौशनी में
कहीं गुम हो जैसे
भागती उड़ती मचलती हवा के झोकों- सी |
रात दर रात बीती बहुत
पर देखो ना ये महक
वैसे ही है आज भी
जैसी हुई करती थी
बरसों पहले |
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: आरोही अग्रवाल
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