कुछ पन्नो को पलटते- पलटते मिल गयी उनमें छिपी एक छोटी-सी ख़ुशी, सोचा साझा कर लूं J
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बीच में टोकते उसे,
मैंने पूछा हलके से |
क्या मैं भी इसको लिख सकती,
पर कोशिश मैंने कभी नही की |
कविता भला कहते हैं किसको,
बिना जाने कैसे लिखूं इसको |
हंसने लगा वो मुझ पर,
उन बचकानी बातों पर |
सुनो जरा ध्यान से,
बताता हूँ इतमीनान से |
जैसे मैंने इसे है जाना,
जब इसने मुझको पहचाना |
भावों की लड़ी है ये
शब्दों से बुनी कड़ी है ये
जाती इस छोर से उस छोर
नदिया जैसे कभी इस ओर तो उस ओर |
खूबसूरत इनायत है उसकी
आसानी से उभरती नहीं
इबादत करो इस भाव की
ये कली हर कहीं खिलती नहीं |
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एहसास की सिलाई पे शब्दों को बुनना
प्यार की कलाई पे डोरी सा बंधना
हौले हौले फिर कलम को चलाना
ऐसे ही सीख जाओगी कविता बनाना |
देखना भावनाएं खुद ही झरेंगी तुम्हारी कलम से
उगती सुबह में खिलती कलियों जैसे,
फिर मैंने भी लिख डाली एक कविता
प्यार के अफसाने की, उस ताने बाने की,
शुक्रिया अनकहे ख्वाब का जो हाथों को
थाम कर लय भरता है इन लफ़्ज़ों में !!
-- आरोही अग्रवाल
-- आरोही अग्रवाल

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Waah sundar....!!!
ReplyDeleteबहुत ही खूब ।।
ReplyDeleteएक दम ऐसा लग रहा था मानो मन को पढ़ते पढ़ते आपने कोरे कागज पर लिख दिया
सरस व् भावपूर्ण
हार्दिक आभार , Sir :)
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