घर की सुबह थी कितनी सुहानी,
माँ का आते ही आवाज़ लगाना,
और हमारा मुहँ-कान ढक कर सो जाना।
फिर वो धीरे से पकड़ती थी कान हमारे,
और हम कहते कि माँ , थोड़ा और सोने दो ना।
देखो वो है सोया , उसको पहले जगाओ,
यूँ कह कहकर करते बहाना,
फिर आधी आँखें खोल करते हम जागने का दिखावा।
“जो जागेगा पहले , मिलेगी उसको प्रशाद कि बर्फी” , माँ कहती ऐसा,
और छलांग लगाकर दोनों का जग जाना,
मुझे पहले मुझे पहले , मुझे कम... क्यूँ उसे ज्यादा ....
माँ कि ट्रिक हमेशा चल जाती थी,
मेरी हर सुबह ऐसे ही खिलती थी।
अब वो मौसम ही कहाँ,
इस नयी जगह, नये जहाँ,
सब बदल गया जैसे,
ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग....अब फ़ोन का अलार्म उठाता है ऐसे।
- आरोही

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