Tuesday, 26 March 2013

ये रंग किसके !!




ये रंग मेरे भी होते अगर 

कितना अच्छा होता ना ।

हल्का हल्का गुलाल , काश मेरे गालों को भी छेड़ता 

कमाल ही होता ना ।
पिचकारी से नन्हे हाथ मुझे भी भिगोते,
पानी से भरे गुबारे ले , मुझपर उढोलते।
गुंजिया बनाकर माँ मीठा खिलाती,
कंडिया डालकर मैं भी सबको दिखाती ।

ये रंग मेरे भी होते अगर 

कितना अच्छा होता ना ।

मेरा बचपन भी काश वैसा रंगीन होता, 

ये कल्पना ही नहीं, अगर सच कि तस्वीर होता ,
फिर मैं भी झूमती, रंगों को बिखेरती 
नाचती घुमती, खुशियों कि होली खेलती ।

ये रंग मेरे भी होते अगर 

कितना अच्छा होता ना ।

अभी इस कशमकश में ही थी , कि भीतर से आवाज़ आई

"वहां कहाँ बैठ गयी जाकर, ना काम की न धाम की कलमुहि-सी, इसे क्या तेरा बाप सम्भालेगा ।"









वाह रे किस्मत, इतने रंग भी बनाये,

पर क्यूँ मेरे लिए एक भी नहीं 
जवाब आया ही नहीं कहीं से...मेरे क्यूँ का...।


--- "आरोही"


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