ये रंग मेरे भी होते अगर
कितना अच्छा होता ना ।
हल्का हल्का गुलाल , काश मेरे गालों को भी छेड़ता
कमाल ही होता ना ।
पिचकारी से नन्हे हाथ मुझे भी भिगोते,
पानी से भरे गुबारे ले , मुझपर उढोलते।
गुंजिया बनाकर माँ मीठा खिलाती,
कंडिया डालकर मैं भी सबको दिखाती ।
ये रंग मेरे भी होते अगर
कितना अच्छा होता ना ।
मेरा बचपन भी काश वैसा रंगीन होता,
ये कल्पना ही नहीं, अगर सच कि तस्वीर होता ,
फिर मैं भी झूमती, रंगों को बिखेरती
नाचती घुमती, खुशियों कि होली खेलती ।
ये रंग मेरे भी होते अगर
कितना अच्छा होता ना ।
अभी इस कशमकश में ही थी , कि भीतर से आवाज़ आई
"वहां कहाँ बैठ गयी जाकर, ना काम की न धाम की कलमुहि-सी, इसे क्या तेरा बाप सम्भालेगा ।"
वाह रे किस्मत, इतने रंग भी बनाये,
पर क्यूँ मेरे लिए एक भी नहीं
जवाब आया ही नहीं कहीं से...मेरे क्यूँ का...।
--- "आरोही"
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