Tuesday, 26 March 2013

मैं हूँ एक उर्जा एक ज्योति एक नूर !!


ये तेरी खता, कि तूने जाना मुझे बस एक शरीर ही
मैं हूँ कुछ और... कुछ और... एक उर्जा एक ज्योति एक नूर ।

किसी के उपयोग की वस्तु नहीं, किसी की इच्छा नहीं
मैं हूँ बहती पवन... सब सिमटा है मुझमें ही ,

सोच... सोच हे मानव, उत्पन्न तू मुझसे ही ,
फिर कैसे मुझे ही मान लिया इतना बिखरा टूटा हुआ ।

ये तेरी खता , कि तूने जाना मुझे बस एक शरीर ही ,
मैं हूँ एक उर्जा एक ज्योति एक नूर ।

तेरे किसी परिचय की मोहताज़ नहीं , सब सिमटा है मुझमें ही ।
अपने चारों और नज़र तो दौड़ा जरा
मैं ही हूँ  तेरे घर-परिवार की नीव ,
माँ, बहिन, पत्नी, बेटी, बहु हर रूप में ।

आसान है मंदिर में बिठाकर आरती घुमाना,
कठिन तो है ग़मगीन चौराहे पर भी कलियाँ सवारना ।

थोड़ा सोच और समझ , इंसान तो बन पहले ।

ये तेरी खता , कि तूने जाना मुझे बस एक शरीर ही ,
मैं हूँ एक उर्जा एक ज्योति एक नूर ।

"आरोही "



No comments:

Post a Comment