ये तेरी खता, कि तूने जाना मुझे बस एक शरीर ही
मैं हूँ कुछ और... कुछ और... एक उर्जा एक ज्योति एक नूर ।
किसी के उपयोग की वस्तु नहीं, किसी की इच्छा नहीं
मैं हूँ बहती पवन... सब सिमटा है मुझमें ही ,
सोच... सोच हे मानव, उत्पन्न तू मुझसे ही ,
फिर कैसे मुझे ही मान लिया इतना बिखरा टूटा हुआ ।
ये तेरी खता , कि तूने जाना मुझे बस एक शरीर ही ,
मैं हूँ एक उर्जा एक ज्योति एक नूर ।
तेरे किसी परिचय की मोहताज़ नहीं , सब सिमटा है मुझमें ही ।
अपने चारों और नज़र तो दौड़ा जरा
मैं ही हूँ तेरे घर-परिवार की नीव ,माँ, बहिन, पत्नी, बेटी, बहु हर रूप में ।
आसान है मंदिर में बिठाकर आरती घुमाना,
कठिन तो है ग़मगीन चौराहे पर भी कलियाँ सवारना ।
थोड़ा सोच और समझ , इंसान तो बन पहले ।
ये तेरी खता , कि तूने जाना मुझे बस एक शरीर ही ,
मैं हूँ एक उर्जा एक ज्योति एक नूर ।
"आरोही "
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