Tuesday, 26 March 2013

मेरा क्या कसूर !!


माँ का हर रूप अलबेला, माँ का प्यार बड़ा अनमोल,

तभी तो गोपाल जी दौड़े-दौड़े आयें, देख मैया के बनाये लड्डू गोल-गोल।

अँखियाँ तरसी मनवा तरसा तेरे आँचल को हर पल,

कह दे माँ मैं तेरी हूँ, मत कर बेटा-बेटा अब ।



मेरी माँ है तू , तेरी ख़ुशी अनोखी,

तेरी एक परछाई को तरसी हूँ मैं ।

तेरे आँचल की छाओं में चलना चाहूँ ,

तू खिलखिला तो जरा झूमुंगी मैं ।

"आरोही"

2 comments:

  1. बहुत ही उम्दा और बेहतरीन कविता लिखा है आप ने , आशा है की हमे अनुप्र्रेरणा मिलेगा !

    आपका शुक्रिया
    रजत सान्याल

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  2. आपका आभार, रजत सान्याल जी !!

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