माँ का हर रूप अलबेला, माँ का प्यार बड़ा अनमोल,
तभी तो गोपाल जी दौड़े-दौड़े आयें, देख मैया के बनाये लड्डू गोल-गोल।
अँखियाँ तरसी मनवा तरसा तेरे आँचल को हर पल,
कह दे माँ मैं तेरी हूँ, मत कर बेटा-बेटा अब ।
मेरी माँ है तू , तेरी ख़ुशी अनोखी,
तेरी एक परछाई को तरसी हूँ मैं ।
तेरे आँचल की छाओं में चलना चाहूँ ,
तू खिलखिला तो जरा झूमुंगी मैं ।
"आरोही"
बहुत ही उम्दा और बेहतरीन कविता लिखा है आप ने , आशा है की हमे अनुप्र्रेरणा मिलेगा !
ReplyDeleteआपका शुक्रिया
रजत सान्याल
आपका आभार, रजत सान्याल जी !!
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