कभी एक सवाल पूछती थी खुद से,
देखें हजारों हैं, जो साथ चलते हैं ,वादे करते हैं
पर जब हार जाएँ हम खुद से,तब साथ कोई देदे,
ऐसा क्या कहीं होता है कोई... ?
कभी एक सवाल पूछती थी खुद से,
झिलमिलाती पलकें, मुस्कुराता चेहरा संजोता है दर्द कई
कोई हाथ पकड़ कर भर दे उसे, हँसना भी सीखा दे ..
ऐसा क्या कहीं होता है कोई...?
जब भूलें हम खुद से ही कुछ कहना...
कोई कहने सुनने लगे हमीं से
ऐसा क्या कहीं सच में, होता है कोई...?
हँसी भी आती थी, निराशा भी होती थी
यूहीं परेशान सी जब पूछ रही थी ये खुद से
तब माँ आई और, हाथ पकड़ कर उठा दिया
और कुछ पूछे-कहे बिना, प्यार से खिलाने लगी मुझे, एक एक निवाला
आंसूं झलक पड़े, ख़ुशी के थे या गम के, कह नही पाई
....पर जवाब मिल गया उसका, जो पूछती थी मैं खुद से!!
"आरोही"
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