सच है फ़र्ज़ के आगे सपने भुला देते हैं कुछ लोग।
मैं आज फिर उन नज़रों से रूबरू हुई ,
ठहरा दर्द का समंदर, बहता सुकून भरा झरना ,
कुछ कहती, वो खामोश निगाहें,
क्या जगमगाहट थी, कैसा झटपटाना था ,
मगर वो कहना सुन पाए कौन, कैसा गरीब का फ़साना था।
सच है फ़र्ज़ के आगे सपने भुला देते हैं कुछ लोग।
कमी उनकी भी नहीं , जो लुटा दें ,सपनों के आगे अपनों की दुनिया
फिर भी कशमकश में रहता है संसार उनका ।
वो नमीं भरा आँचल, वो गहरा प्यार-सा दरिया ,
फिर क्यूँ लौट कर न आया, वैसा खुशियों भरा चेहरा।
सच है फ़र्ज़ के आगे सपने भुला देते हैं कुछ लोग।
कैसे पता ही न चला , बोल दी मुझी से वो ,
रुको, ठहरो, सुनो ज़रा,
जो वो कह ही न पाए, जो हम सुन ही न पाए,
कि फ़र्ज़ के आगे सपने भुला देते हैं कुछ लोग।
मैं आज फिर उन नज़रों से रूबरू हुई।
"आरोही"
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