Tuesday, 26 March 2013

एक सपना ऐसा भी देखा .. !!


एक सपना ऐसा भी देखा , कहने को जो एक सपना था |


आग देख जब चारों ओर, डरी सहमी सी भाग रही मैं  इधर-उधर
दबी फंसी सी , जब कराह रही थी थमीं वहां ,
घावों को संजोते-संजोते, जाऊं किस मंजिल की ओर

चेहरा दिखा तभी भोला सा, जाने वो था  क्या ढूंढ़ रहा
पल भर को देखा उसकी ओर, इस जग को भी देखा मैंने ,
फिर रुक कर , छुपा लिया उसको, जैसे अकेले कहाँ ये जायेगा
भूल गयी उस पल कि खुद भी तो यहाँ फंसी हुई
बस छुपा लिया उसको भी जैसे, अकेले कहाँ ये जाएगा

समझ न आए माझी कौन बनेगा, कौन किनारे लगाये हमें
कह रही हूँ जैसे उसको, मत जा, उस दारुण संसार



एक सपना ऐसा भी देखा, कहने को जो एक सपना था |



वो नटखट-सा कुछ अद्भुत-सा, अंगुली पकड़ ले गया वहां,
कहने लगा वो थी माया,ये है असली जग का आकार |

मैं ठगी हुई सी, गुमसुम सी बस देख रही
उस अनोखे को, और देखूं उस कृति को
जहां रुदन था, क्रुन्दन था, वहां भी क्या सुख हो सकता ?
जहाँ दगा है, जहाँ है आहें, क्या वहां भी प्रेम यूँ खिल सकता ?


देख रही थी ठगी हुई सी, यूँ गुमसुम सी, मैं अविरल सी,
फिर पकड़ लिया, मेरे मन को, उस गिरधर ने, गोपाल ने l

और हंसा वो, ज़ोरों से बोला
“ देखेगी तू जिसको...वही तुझे मैं दिखलाऊंगा ,
वहीँ तुझे ले जाऊंगा |"



तुमने देखा क्रुन्दन को, और परेशान गयी तू हो
भूल गई  क्या ?

सुख-दुःख , तो मेरी माया,
तू सींच रही यूहीं, इस गहरे डर को अपने, तो ऐसा मंजर आना ही था |


अब देख ज़रा मेरी नज़रों से, मेरे इस संसार को,
अब देख ज़रा सब अर्पण कर मुझको, मेरे इस पावन आकार को |
यहाँ घृणा नहीं, न आहें हैं, सिर्फ प्रेम ही प्रेम समाया  है |

तू चलना मेरे संग सीख ले, मुझको ही जी भर तू देख ले,
फिर प्रेम ही प्रेम नज़र आये!


मैं भी भर दूँ तेरे इस बंज़र मन को, मेरे प्रेम भरे उस गीत से,
फिर प्रेम ही प्रेम नज़र आए, मुझको ही जी भर तू देख ले |

ख़ुशी ऐसी मिली मुझे, झूमने लगी खुद में ही मैं,


जब ख्याल आया उस नटखट का, फिर पगली हो, ढूँढू उसे यहाँ-वहाँ

उसकी वो मीठी बंसी वो सुंदर हठीली बातें,कह पड़ी जैसे मुझसे फिर

‘प्रेम ही प्रेम नज़र आए, मुझको ही जी भर तू देखले |‘


अब नज़रें घुमाई तो पाया उसे ही,

पंछियों के चह्चाहने में, उस हवा, उस फसाने में |

फिर झूम उठा ये मन, जैसे मिला हो नया जीवन
जहाँ प्रेम ही प्रेम समाया है, एक जीवन, जहाँ प्रेम ही प्रेम समाया है |



एक सपना ऐसा भी देखा, कहने को जो एक सपना था |

तभी कहते, की सपने भी यदा-कदा यूँ आते हैं,
हमको खुद से अपनी पहचान कराते हैं |

सच है क्या? किस राह तुझे चलना है, ओ राही !
मंजिल, कहाँ है तेरी ? कहाँ? वो तेरी राह ताक रही |

बस प्रेम ही प्रेम तू करता चल,  वो संग तेरे ही आएगा |
तू नाम उसी का लेता चल, उसमे ही समा जायेगा |

एक सपना ऐसा भी देखा, कहने को जो एक सपना था |

"आरोही "

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