एक अनोखा दिन जिसे लोग प्यार के दिन के अफज़ में
मनाते हैं | इसमें भी कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष, अजीब लगता है सुनकर प्यार का भी
विपक्ष ?? पर मुझे सुकून मिलता है ये दिन तेरे साथ मनाने का, हाँ तेरे साथ तेरा
जन्मदिन मनाना और कहना कि पार्टी कहाँ है ? और फिर तेरा मुस्कुराना, “अरे ! इस
उम्र में पार्टी कि गुंजाईश सोचती हो मेरे लिए; इस बुड़ाते हुए शरीर को सब दिन एक
से हैं |” फिर मेरा भी थोडा-सा गुस्सा दिखाते हुए कहना, “अरे, मान गयी बूड़ी हो रही
हो, मैं तो कबसे कहती थी सुनती ही नही थी, अब पार्टी मांगी तो उम्र का उलाहना देती
हो; और फिर दोनों का ठहाका लगाकर हंसना |
हाँ ! तेरा होना बड़ा ही प्यारा एहसास है मेरे लिए
| कोई है जिससे मैं कुछ भी कभी भी कह सकती हूँ, बिना सोचे, बस ऐसा जैसा मन को लगे
| आज तेरे साथ नही हूँ तो याद आ रही है तेरी ...और वो हर पल जिसमें कितनी हंसी-मस्ती
बांटी मैंने तेरे साथ, जिसे सब जनरेशन गैप कहते हैं, मैंने उस छोर पर खड़े हो तुझे
अपने साथ महसूस किया वो भी बिना किसी मनमुटाव और दूरी के | तुझसे कोई रिश्ता तो
नही मेरा, फिर भी इतनी अपनी और अच्छी लगती हो कि क्या कहूँ, नहीं जानती | तुझसे
बातें करना, समय गुजारना कुछ अपना-सा लगता है, कह नही सकती क्यूँ | पहर दर पहर
कैसे बीत जाते हैं पता ही नहीं चलता मुझे | न हम-उम्र है मेरी जो तुझे सहेली का
दर्जा दूँ, न कोख से जन्मा मुझे जो माँ कहकर पुकारूं, न कहानी सुनाई तूने मुझे कभी
दादी जैसे , फिर दादी भी क्यूँ कहूँ तुझे | पर देख ना ... दिन भर बैठ जायें तो सहेलियों
जैसे हमारी बातें पूरी ही नहीं होती, बार-बार जाते वक्त भी तेरा हाथ पकड़ कर रोक
लेना ...कि कुछ देर और बैठ जाओ ना | माँ जैसे डांट कर प्यार से खिलाती हो, और फिर
दादी जैसे झुर्रिइयां पड़े कोमल हाथों से दुलार कर गले से लगाती हो मुझे | पता नही
क्यूँ तुझसे हंसी-मज़ाक करना...आह! बहुत भाता है मुझे | जब भी घर आना तुमसे मिलना |
कुछ तेरी सुनना फिर कुछ अपनी कहना ...और कभी-कभी तो बस अपनी ही कहते जाना....ये
हुआ, ऐसा हुआ, वैसा हुआ .... और तू बड़े आराम से सुनती जाती है मेरी | इतने प्यार
से कि मुझे और प्यार आने लगता है तुझ पर | तेरा हमेशा की तरह गॉड ब्लेस कहना, एक
अलग तरह की डोरी बंधी है मेरे मन की तुझसे | हाँ ऐसे ही मनाती हूँ मैं प्यार का दिन
इस खट्टी-मीठी श्याही में डूबे | बहुत प्यारा ! जहां कोई बांधें ना, पर आप बंध
जायें, जिसमे कोई रोके न पर आप थम जायें, जिसमे प्यार माँगा न जाये, वो खुद नदिया-सा
बहे, जहाँ ये छल न होकर, एक निर्मल निश्छल मन में अठखेलियाँ करता अरनव हो, और इसे
आपकी रूह एक या दो दिन नहीं अपितु उम्रभर जिए; ऐसा लगे मानो इबादत कर रहे हो खुदा
की, उसी के तरीके से, उसी के होकर | J J
- -- -- आरोही अग्रवाल

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