आजा साजना आजा, किसी दिवस किसी रैन,
ताकते तेरा रास्ता, भीगे-भरे ये बावरे नैन ।
कह दे बस कुछ पल का , है और इंतज़ार,
फिर तरसे मन को होगा तेरा दीदार ।
कह दे बस कुछ पल का , है और इंतज़ार,
फिर तरसे मन को होगा तेरा दीदार ।
देख तो सही, कैसे ये
मन पल-पल छले मुझे,
हवा कि सरन-सरन, तेरे आने
कि आहट लगे मुझे ।
कैसे पगली-सी, हाँ
पगली-सी हो गयी,
तुझे सोच-सोच मैं तुझमें खो गयी,
बिन हुए भी तेरी ही हो गयी ।
पत्तों कि ओट से दूर तक झांकती,
दौड़े-दौड़े मौड़ तक पत्थरों पर
भागती।
पर क्षितिज तक उड़ती धूल भी,
पर क्षितिज तक उड़ती धूल भी,
मानो गुमसुम है, कैसे मुझे ही ताकती।
यूँ पल बीते जा रहे, ये दिन बीते जा रहे,
क्यूँ ख़बर नहीं तेरी कोई, अब ये
नैना सूखे जा रहे।
आजा साजना आजा, किसी दिवस किसी रैन,
आजा साजना आजा, किसी दिवस किसी रैन,
ताकते तेरा रास्ता, भीगे भरे
ये बावरे नैन ।
तू मस्त गगन का पंछी रे,
अब ऊँचे-ऊँचे उड़ता फिरे।
मैं हूँ तेरी बावरी,
ठहरी यहीं,
इस नदिया तीर ।
आजा साजना आजा, किसी दिवस किसी रैन,
ताकते तेरा रास्ता, भीगे-भरे ये बावरे नैन ।
कह दे बस कुछ पल का है और इंतज़ार,
फिर तरसे मन को होगा तेरा दीदार ।
-"आरोही "

No comments:
Post a Comment