Tuesday, 11 February 2014

वो ख्वाब – एक दुआ !!

कुछ पन्नो को पलटते- पलटते मिल गयी उनमें छिपी एक छोटी-सी ख़ुशी, सोचा साझा कर लूं J
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बीच में टोकते उसे,
मैंने पूछा हलके से |
क्या मैं भी इसको लिख सकती,
पर कोशिश मैंने कभी नही की |

कविता भला कहते हैं किसको,
बिना जाने कैसे लिखूं इसको |
हंसने लगा वो मुझ पर,
उन बचकानी बातों पर |

सुनो जरा ध्यान से,

बताता हूँ इतमीनान से |
जैसे मैंने इसे है जाना,
जब इसने मुझको पहचाना |

भावों की लड़ी है ये
शब्दों से बुनी कड़ी है ये
जाती इस छोर से उस छोर
नदिया जैसे कभी इस ओर तो उस ओर |

खूबसूरत इनायत है उसकी
आसानी से उभरती नहीं
इबादत करो इस भाव की
ये कली हर कहीं खिलती नहीं |

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एहसास की सिलाई पे शब्दों को बुनना
प्यार की कलाई पे डोरी सा बंधना
हौले हौले फिर कलम को चलाना
ऐसे ही सीख जाओगी कविता बनाना |

देखना भावनाएं खुद ही झरेंगी तुम्हारी कलम से
उगती सुबह में खिलती कलियों जैसे,

फिर मैंने भी लिख डाली एक कविता

प्यार के अफसाने की, उस ताने बाने की,

शुक्रिया अनकहे ख्वाब का जो हाथों को
थाम कर लय भरता है इन लफ़्ज़ों में !!

-- आरोही अग्रवाल

Saturday, 8 February 2014

कुछ मेरी नज़र से !!



कुछ अंजाम मुक्कमल हो जायें,
ये सोच मुहब्बत नही होती |
कुछ चाहे अनचाहे मिल जायें,
ये देख दरारें नही पड़ती |

दिल पत्थर सा शीश नहीं,
जो झुकते ही धड़ गिर जाए |
ये लौ है अमिट अविरल सी,
जो अंधियारी में भी डट जाए |

किन्ही शब्दों का जंजाल नहीं,
जिसमें पकड़ा छोड़ा जाए |
ये नाम है जीने मरने का,
बिना जिए ही मरने का,
और मरकर फिर से जीने का |

ये किसी बुद्धि की उपज नही,
जो हिचकोलों से डिग जाए |
ये आह्लादित मन का अंकुर है,
आँचल में जाने कब खिल जाये |

ये मिल जाये वो मिल जाये,
ये मर्म नहीं इस वेदन में |
जो तुम मुठी में छिपा रहे,
उसको बहने दो चेतन में |

अरनव की ये लहर बहेगी,
तल पर हर पल निश्चल मन में |
स्वफूटित हो फिर कली खिलेगी,
क्षितिज़ तलक हर कोने में |

जो तुम मुठी में छिपा रहे,
उसको बहने दो चेतन में |
अरनव की ये लहर बहेगी,
तल पर हर पल निश्चल मन में |



: आरोही अग्रवाल 

Wednesday, 5 February 2014

तेरे होने की ख़ुशी !!

दिन, तारीखें, बातें, यादें
भला कैसे याद ना रहे
हर ख़ास दिन तेरा तुझसे जुड़ा
भूलूं , कहो कैसे जो सब तुझमें गुंधा हो मेरा
कुछ आदत सी हैं इन आते-जाते
छोटे-छोटे लम्हों को समेटकर रखने की
उसी गोल-मटोल संदूक में
जिसके बस होने भर से
हर कोने में
वही महक बसा करती है
जो उभरी थी कली-सी खिलकर
उस रोज़ जब तुमने दस्तक दी थी
पहली बार मन में मेरे
लय भरी थी इस जीने में |

आज फिर जब हौले से हाथ फेरा
उन सहेजी हुई यादों पर
वही एहसास, वही ख़ुशी
जैसे कहीं झूम रही हो ये रूह
फूलों की बरखा में
झरोकों से गुजरती मद्धम सी रौशनी में
कहीं गुम हो जैसे  
भागती उड़ती मचलती हवा के झोकों- सी |

रात दर रात बीती बहुत
पर देखो ना ये महक
वैसे ही है आज भी
जैसी हुई करती थी
बरसों पहले |
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: आरोही अग्रवाल