गुटरगूं गुटरगूं...हाँ इसी से नींद खुलती थी
मिन्नी की, हॉस्टल में हर सुबह कुछ ऐसी थी उसके लिए | माँ की आवाज़ सरीखी तो नहीं,
पर कुछ दोस्ती-सी हो गयी थी इससे उसकी | नितांत चारदीवारी वाले घर में रहने वाली
प्रकृति के इन सिपाहियों से कभी मिल ही न पायी पहले |
हॉस्टल का वो पहला दिन, और वो थके-थके से कदम जब
वहां मिले कमरे में पड़े; चिल्ला पड़ी थी मिनी अनायास ही, ख़ुशी से, “अरे कबूतरों का
जोड़ा ! वो भी मेरे इतने पास”, कमरे को हवादार बनाती खिड़की के छज्जे पर घोंसला
बनाये रहते थे दोनों | सहसा ही जी उठी वो, वरना घर से दूर आना उसे गवारा कहाँ था |
तो आप भी हमारे साथ रहेंगे यहाँ, फिर दोस्ती तो करनी पड़ेगी ना, और कहते ही कहते
नामकरण कर दिया दोनों का, क्रेजी और क्रिस्पी | सुबह जागते ही सबसे पहले, “गुड
मोर्निंग क्रेजी क्रिस्पी ; अच्छा हुआ टाइम से जगा दिया , वरना तो रब राखे; वो भी
पंख फड़फड़ा मानो जवाब देने लगें हों उसका | तुम दोनों ऐसे ही बतियाते रहना दिन भर,
मैं दोपहर बाद मिलूंगी तुम दोनों से |” और ऐसा कह अपने ख्वाबों को एक रूप देने में
जुट जाती थी | और फिर काम से निबटकर जब आती तो उन्हें देख एक भीनी से मुस्कराहट आ
जाती उसके चेहरे पर, सारी थकान एक पल में ही छूमंतर |
उस अधखुली खिड़की पर मिनी ना जाने दिन के कितने
पहर आती .... कभी क्रेजी – क्रिस्पी को दाना डालने, कभी उनकी गुटुर्गूँ सुनने तो
कभी यूँही अपना मन बहलाते हुए उनसे गपशप करने | सहेलियों के साथ से अच्छा उसे इनसे बातें करना
लगता, हो भी क्यूँ ना .....हर सुख दुःख बाँट लेती थी उनसे और वो दोनों भी बड़ी ही
शालीनता से उसके हर कहे पर गुटरगूं गुटरगूं करते थे, ज्यों हामी भरते हों हर बात
पर | “आज मौसम देखो कितना सुहाना... क्यूँ ना चाय हो जाये...क्या कहते हो ?, ......गुटरगूं
गुटरगूं |” “देखो क्रेजी क्रिस्पी ये कैसा लग रहा है?”, नया ब्रेसलेट लायी थी मिनी
और उनका उछल उछल के फड़फड़ाना; इसी में जवाब ढूंढ लिया मिन्नी ने; “माँ का फ़ोन आया
है, घर आने को कह रही हैं ... और फिर कोई आवाज़ न आना; अरे बाबा ! नाराज़ क्यूँ होते
हो, मैंने मना कर दिया कि मालूम है मेरे बिना कौन ध्यान रखेगा तुम्हारा |” जिसे देखो उनके बारे में बताती, जैसे एक नयी
ज़िन्दगी मिली हो उसे वहां | एक सुकून इस अजब से रिश्ते के एहसास से |
ऐसे सब चल ही रहा था
कि एक दिन अचानक, ‘सुनो ! आज ऐसे उछल कूद मत करो; चुपचाप ये दाने खा लो |’ समय की
नाजुकता को समझते हुए दाना चुगने लगे दोनों .....बीच-बीच में क्रेजी गर्दन उठा
अपनी गोल मटोल आँखें घुमा घुमा मिनी को देखता...जैसे पूछता हो कुछ; ‘आज मेरा मूड
अच्छा नही, मेरी दादी की तबियत ठीक नही है ...मैं कल घर जा रही हूँ ; विन्नी को बोल
दिया है कुछ दिन वो दाना खिलाएगी तुम्हे, परेशान मत करना उसे, तुम दोनों ध्यान
रखना अपना, वो काली बिल्ली भी आजकल यहीं घुमती है और हाँ ! ज्यादा शरारते नहीं,
समझे ! क्रिस्पी भी टुकुर टुकुर उसे ही सुन रही थी; मिन्नी अब नम आँखें लिए खिड़की
से दूर पलंग पर बैठ गयी अपने दादी के बारे में सोचते-सोचते | सुबह भोर होने से
पहले ही निकल पड़ी थी मिन्नी दादी से मिलने | घर में कब २ हफ्ते हो गये मालूम ही न
चला | इन कुछ दिनों में दादी भी पहले जैसे ही स्वस्थ हो गयी और मिन्नी चली आई
वापिस अपने काम पर |
हॉस्टल में घुसते ही तेज़-तेज़ कदम बढ़ा रही थी,
पहली बार क्रेजी क्रिस्पी से इतने समय अलग जो रही, उनसे मिलने की परिकल्पना ही खुश
कर रही थी उसे | माँ से बाजरे के दाने भी लायी थी इस बार | कमरे में घुसते ही बैग
पलंग पर, पहले उसमे रखे बाजरे के दाने निकाले, और चह्कती हुई सी खिड़की की तरफ मुड़ी,
‘ क्रेजी क्रिस्पी ! ये देखो मैं आ गयी, और तुम्हारे लिए लायीं हूँ ...कहते ही
मुट्ठी खिड़की से बाहर छज्जे की ओर बढ़ा दी ....पर ये क्या घोंसले में से दोनों ही
गायब थे !.....कभी इधर देखती, कभी उधर, कभी आवाज़ लगाती पर कोई पंछी नही... दूर दूर
तक | तभी नज़र पड़ी वहीं आसपास बिखरे पंखों पर... “कहीं उस बिल्ली ने तो कुछ
........ नही ! ऐसा नही हो सकता !”, सहम
गयी थी मिन्नी | अनचाहे आंसुओ को रोकते ..... आवाज़ पर आवाज़ लगाये जा रही थी ,
हॉस्टल में इधर उधर भागती हुई ,,,आती जाती हर लडकी से पूछती अपने नन्हे दोस्तों के
बारे में | हांफते हांफते जब विन्नी के कमरे में पहुंची तो वो हताश हुआ चेहरा ख़ुशी
में बदल गया | दरवाजा खुलते ही ... उसे अपने दोस्तों के मीठे स्वर जो सुनाई पड़े
...गुटरगूं गुटरगूं.... जो फुदकते हुए दाना चुग रहे थे | लपककर गोदी में उठा लिया
दोनों को ओर सहलाने लगी ख़ुशी के आंसू लिए | क्रिस्पी के शरीर पर लगे घावों ने सब
माजरा समझा दिया मिन्नी को | उसने विन्नी को गले से लगाया , “मैं तो काँप ही गयी
थी , पर इन्हें सही सलामत देख जान में जान आ गयी है मेरे, नही जानती तेरा शुक्रिया
कैसे करूं |”
फिर से व्यस्त हो गयी मिन्नी क्रेजी क्रिस्पी को
निहारने में और उनकी अनकही बातें समझने में ... गुटरगूं गुटरगूं |
-- आरोही अग्रवाल
-- आरोही अग्रवाल




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