Tuesday, 29 April 2014

मीठे ये स्वर !!

गुटरगूं गुटरगूं...हाँ इसी से नींद खुलती थी मिन्नी की, हॉस्टल में हर सुबह कुछ ऐसी थी उसके लिए | माँ की आवाज़ सरीखी तो नहीं, पर कुछ दोस्ती-सी हो गयी थी इससे उसकी | नितांत चारदीवारी वाले घर में रहने वाली प्रकृति के इन सिपाहियों से कभी मिल ही न पायी पहले |
हॉस्टल का वो पहला दिन, और वो थके-थके से कदम जब वहां मिले कमरे में पड़े; चिल्ला पड़ी थी मिनी अनायास ही, ख़ुशी से, “अरे कबूतरों का जोड़ा ! वो भी मेरे इतने पास”, कमरे को हवादार बनाती खिड़की के छज्जे पर घोंसला बनाये रहते थे दोनों | सहसा ही जी उठी वो, वरना घर से दूर आना उसे गवारा कहाँ था | तो आप भी हमारे साथ रहेंगे यहाँ, फिर दोस्ती तो करनी पड़ेगी ना, और कहते ही कहते नामकरण कर दिया दोनों का, क्रेजी और क्रिस्पी | सुबह जागते ही सबसे पहले, “गुड मोर्निंग क्रेजी क्रिस्पी ; अच्छा हुआ टाइम से जगा दिया , वरना तो रब राखे; वो भी पंख फड़फड़ा मानो जवाब देने लगें हों उसका | तुम दोनों ऐसे ही बतियाते रहना दिन भर, मैं दोपहर बाद मिलूंगी तुम दोनों से |” और ऐसा कह अपने ख्वाबों को एक रूप देने में जुट जाती थी | और फिर काम से निबटकर जब आती तो उन्हें देख एक भीनी से मुस्कराहट आ जाती उसके चेहरे पर, सारी थकान एक पल में ही छूमंतर |
उस अधखुली खिड़की पर मिनी ना जाने दिन के कितने पहर आती .... कभी क्रेजी – क्रिस्पी को दाना डालने, कभी उनकी गुटुर्गूँ सुनने तो कभी यूँही अपना मन बहलाते हुए उनसे गपशप करने |  सहेलियों के साथ से अच्छा उसे इनसे बातें करना लगता, हो भी क्यूँ ना .....हर सुख दुःख बाँट लेती थी उनसे और वो दोनों भी बड़ी ही शालीनता से उसके हर कहे पर गुटरगूं गुटरगूं करते थे, ज्यों हामी भरते हों हर बात पर | “आज मौसम देखो कितना सुहाना... क्यूँ ना चाय हो जाये...क्या कहते हो ?, ......गुटरगूं गुटरगूं |” “देखो क्रेजी क्रिस्पी ये कैसा लग रहा है?”, नया ब्रेसलेट लायी थी मिनी और उनका उछल उछल के फड़फड़ाना; इसी में जवाब ढूंढ लिया मिन्नी ने; “माँ का फ़ोन आया है, घर आने को कह रही हैं ... और फिर कोई आवाज़ न आना; अरे बाबा ! नाराज़ क्यूँ होते हो, मैंने मना कर दिया कि मालूम है मेरे बिना कौन ध्यान रखेगा तुम्हारा |”  जिसे देखो उनके बारे में बताती, जैसे एक नयी ज़िन्दगी मिली हो उसे वहां | एक सुकून इस अजब से रिश्ते के एहसास से |

                ऐसे सब चल ही रहा था कि एक दिन अचानक, ‘सुनो ! आज ऐसे उछल कूद मत करो; चुपचाप ये दाने खा लो |’ समय की नाजुकता को समझते हुए दाना चुगने लगे दोनों .....बीच-बीच में क्रेजी गर्दन उठा अपनी गोल मटोल आँखें घुमा घुमा मिनी को देखता...जैसे पूछता हो कुछ; ‘आज मेरा मूड अच्छा नही, मेरी दादी की तबियत ठीक नही है ...मैं कल घर जा रही हूँ ; विन्नी को बोल दिया है कुछ दिन वो दाना खिलाएगी तुम्हे, परेशान मत करना उसे, तुम दोनों ध्यान रखना अपना, वो काली बिल्ली भी आजकल यहीं घुमती है और हाँ ! ज्यादा शरारते नहीं, समझे ! क्रिस्पी भी टुकुर टुकुर उसे ही सुन रही थी; मिन्नी अब नम आँखें लिए खिड़की से दूर पलंग पर बैठ गयी अपने दादी के बारे में सोचते-सोचते | सुबह भोर होने से पहले ही निकल पड़ी थी मिन्नी दादी से मिलने | घर में कब २ हफ्ते हो गये मालूम ही न चला | इन कुछ दिनों में दादी भी पहले जैसे ही स्वस्थ हो गयी और मिन्नी चली आई वापिस अपने काम पर |
हॉस्टल में घुसते ही तेज़-तेज़ कदम बढ़ा रही थी, पहली बार क्रेजी क्रिस्पी से इतने समय अलग जो रही, उनसे मिलने की परिकल्पना ही खुश कर रही थी उसे | माँ से बाजरे के दाने भी लायी थी इस बार | कमरे में घुसते ही बैग पलंग पर, पहले उसमे रखे बाजरे के दाने निकाले, और चह्कती हुई सी खिड़की की तरफ मुड़ी, ‘ क्रेजी क्रिस्पी ! ये देखो मैं आ गयी, और तुम्हारे लिए लायीं हूँ ...कहते ही मुट्ठी खिड़की से बाहर छज्जे की ओर बढ़ा दी ....पर ये क्या घोंसले में से दोनों ही गायब थे !.....कभी इधर देखती, कभी उधर, कभी आवाज़ लगाती पर कोई पंछी नही... दूर दूर तक | तभी नज़र पड़ी वहीं आसपास बिखरे पंखों पर... “कहीं उस बिल्ली ने तो कुछ ........ नही ! ऐसा नही हो सकता !”,  सहम गयी थी मिन्नी | अनचाहे आंसुओ को रोकते ..... आवाज़ पर आवाज़ लगाये जा रही थी , हॉस्टल में इधर उधर भागती हुई ,,,आती जाती हर लडकी से पूछती अपने नन्हे दोस्तों के बारे में | हांफते हांफते जब विन्नी के कमरे में पहुंची तो वो हताश हुआ चेहरा ख़ुशी में बदल गया | दरवाजा खुलते ही ... उसे अपने दोस्तों के मीठे स्वर जो सुनाई पड़े ...गुटरगूं गुटरगूं.... जो फुदकते हुए दाना चुग रहे थे | लपककर गोदी में उठा लिया दोनों को ओर सहलाने लगी ख़ुशी के आंसू लिए | क्रिस्पी के शरीर पर लगे घावों ने सब माजरा समझा दिया मिन्नी को | उसने विन्नी को गले से लगाया , “मैं तो काँप ही गयी थी , पर इन्हें सही सलामत देख जान में जान आ गयी है मेरे, नही जानती तेरा शुक्रिया कैसे करूं |”

फिर से व्यस्त हो गयी मिन्नी क्रेजी क्रिस्पी को निहारने में और उनकी अनकही बातें समझने में ... गुटरगूं गुटरगूं |
-- आरोही अग्रवाल

Monday, 17 March 2014

एक ख़ास दिन ख़ास शख्स के नाम - डायरी का एक पन्ना (14 feb)


एक अनोखा दिन जिसे लोग प्यार के दिन के अफज़ में मनाते हैं | इसमें भी कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष, अजीब लगता है सुनकर प्यार का भी विपक्ष ?? पर मुझे सुकून मिलता है ये दिन तेरे साथ मनाने का, हाँ तेरे साथ तेरा जन्मदिन मनाना और कहना कि पार्टी कहाँ है ? और फिर तेरा मुस्कुराना, “अरे ! इस उम्र में पार्टी कि गुंजाईश सोचती हो मेरे लिए; इस बुड़ाते हुए शरीर को सब दिन एक से हैं |” फिर मेरा भी थोडा-सा गुस्सा दिखाते हुए कहना, “अरे, मान गयी बूड़ी हो रही हो, मैं तो कबसे कहती थी सुनती ही नही थी, अब पार्टी मांगी तो उम्र का उलाहना देती हो; और फिर दोनों का ठहाका लगाकर हंसना |


हाँ ! तेरा होना बड़ा ही प्यारा एहसास है मेरे लिए | कोई है जिससे मैं कुछ भी कभी भी कह सकती हूँ, बिना सोचे, बस ऐसा जैसा मन को लगे | आज तेरे साथ नही हूँ तो याद आ रही है तेरी ...और वो हर पल जिसमें कितनी हंसी-मस्ती बांटी मैंने तेरे साथ, जिसे सब जनरेशन गैप कहते हैं, मैंने उस छोर पर खड़े हो तुझे अपने साथ महसूस किया वो भी बिना किसी मनमुटाव और दूरी के | तुझसे कोई रिश्ता तो नही मेरा, फिर भी इतनी अपनी और अच्छी लगती हो कि क्या कहूँ, नहीं जानती | तुझसे बातें करना, समय गुजारना कुछ अपना-सा लगता है, कह नही सकती क्यूँ | पहर दर पहर कैसे बीत जाते हैं पता ही नहीं चलता मुझे | न हम-उम्र है मेरी जो तुझे सहेली का दर्जा दूँ, न कोख से जन्मा मुझे जो माँ कहकर पुकारूं, न कहानी सुनाई तूने मुझे कभी दादी जैसे , फिर दादी भी क्यूँ कहूँ तुझे | पर देख ना ... दिन भर बैठ जायें तो सहेलियों जैसे हमारी बातें पूरी ही नहीं होती, बार-बार जाते वक्त भी तेरा हाथ पकड़ कर रोक लेना ...कि कुछ देर और बैठ जाओ ना | माँ जैसे डांट कर प्यार से खिलाती हो, और फिर दादी जैसे झुर्रिइयां पड़े कोमल हाथों से दुलार कर गले से लगाती हो मुझे | पता नही क्यूँ तुझसे हंसी-मज़ाक करना...आह! बहुत भाता है मुझे | जब भी घर आना तुमसे मिलना | कुछ तेरी सुनना फिर कुछ अपनी कहना ...और कभी-कभी तो बस अपनी ही कहते जाना....ये हुआ, ऐसा हुआ, वैसा हुआ .... और तू बड़े आराम से सुनती जाती है मेरी | इतने प्यार से कि मुझे और प्यार आने लगता है तुझ पर | तेरा हमेशा की तरह गॉड ब्लेस कहना, एक अलग तरह की डोरी बंधी है मेरे मन की तुझसे | हाँ ऐसे ही मनाती हूँ मैं प्यार का दिन इस खट्टी-मीठी श्याही में डूबे | बहुत प्यारा ! जहां कोई बांधें ना, पर आप बंध जायें, जिसमे कोई रोके न पर आप थम जायें, जिसमे प्यार माँगा न जाये, वो खुद नदिया-सा बहे, जहाँ ये छल न होकर, एक निर्मल निश्छल मन में अठखेलियाँ करता अरनव हो, और इसे आपकी रूह एक या दो दिन नहीं अपितु उम्रभर जिए; ऐसा लगे मानो इबादत कर रहे हो खुदा की, उसी के तरीके से, उसी के होकर | J J

-   -- -- आरोही अग्रवाल 

Sunday, 2 March 2014

अनोखा उपहार !!

“अरे सीमा ! मत जा उधर, कहीं मेज पर रखीं स्याही न उड़ेल देना, तेरे पीछे भाग सकूँ इतनी हिम्मत नहीं रही अब मुझमें; सीमा भी रुआंसा सी हो रुक गयी, कि ऐसा क्या लिखते रहते हो इन पन्नों में, कुछ बताते भी नहीं?” काका ने हँसते हुए उसे गोदी में बिठा लिया, “रे मेरी शरारती बच्ची, जब मेरी छोटी सी गुड़िया दुल्हन के जोड़े में सज किसी और नगरी जाएगी ना तबके लिए है ये सब |” समय के साथ सीमा भी ये सब बातें भूल गयी, पर आज जब दुलहन के जोड़े में सजी बैठी थी काका की गुड़िया तो अनायास ही हर ओझिल हुआ दृश्य समक्ष ही बनने लगा | ये वही काका, जिन्होंने बचपन से लेकर बड़े होने तक कामकाजी माता-पिता की कमी महसूस ही न होने दी उसे | तभी दरवाजे पर कोई आहट हुई, करीने से झाँका तो हाथ में कुछ खतों को समेटे वही काका खड़े थे | सीमा की खुशी का कोई छोर ही न हो जैसे | प्यार से अपनी नन्ही को दुलारते, उसकी ओर उस अलबेली सौगात को बढ़ा दिया, “अपने काका की सीख समझ के रख लेना इन खतों को, हर अच्छे बुरे समय कि परिकल्पना से ही जो नन्ही पारी डर जाती थी न, उसे अब कैसे एक नये परिवार को सम्भालना है, कैसे एक नया जहाँ बनाना है, सब तेरे स्वभावानुसार लिखने की कोशिश की है मैंने | ” तेरा गरीब काका बस इतना ही कर सका | सीमा के बहते आंसू थम ही न रहे थे कि कैसे गणना करे इस अमूल्य उपहार की |
-आरोही

Tuesday, 11 February 2014

वो ख्वाब – एक दुआ !!

कुछ पन्नो को पलटते- पलटते मिल गयी उनमें छिपी एक छोटी-सी ख़ुशी, सोचा साझा कर लूं J
...............

बीच में टोकते उसे,
मैंने पूछा हलके से |
क्या मैं भी इसको लिख सकती,
पर कोशिश मैंने कभी नही की |

कविता भला कहते हैं किसको,
बिना जाने कैसे लिखूं इसको |
हंसने लगा वो मुझ पर,
उन बचकानी बातों पर |

सुनो जरा ध्यान से,

बताता हूँ इतमीनान से |
जैसे मैंने इसे है जाना,
जब इसने मुझको पहचाना |

भावों की लड़ी है ये
शब्दों से बुनी कड़ी है ये
जाती इस छोर से उस छोर
नदिया जैसे कभी इस ओर तो उस ओर |

खूबसूरत इनायत है उसकी
आसानी से उभरती नहीं
इबादत करो इस भाव की
ये कली हर कहीं खिलती नहीं |

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एहसास की सिलाई पे शब्दों को बुनना
प्यार की कलाई पे डोरी सा बंधना
हौले हौले फिर कलम को चलाना
ऐसे ही सीख जाओगी कविता बनाना |

देखना भावनाएं खुद ही झरेंगी तुम्हारी कलम से
उगती सुबह में खिलती कलियों जैसे,

फिर मैंने भी लिख डाली एक कविता

प्यार के अफसाने की, उस ताने बाने की,

शुक्रिया अनकहे ख्वाब का जो हाथों को
थाम कर लय भरता है इन लफ़्ज़ों में !!

-- आरोही अग्रवाल

Saturday, 8 February 2014

कुछ मेरी नज़र से !!



कुछ अंजाम मुक्कमल हो जायें,
ये सोच मुहब्बत नही होती |
कुछ चाहे अनचाहे मिल जायें,
ये देख दरारें नही पड़ती |

दिल पत्थर सा शीश नहीं,
जो झुकते ही धड़ गिर जाए |
ये लौ है अमिट अविरल सी,
जो अंधियारी में भी डट जाए |

किन्ही शब्दों का जंजाल नहीं,
जिसमें पकड़ा छोड़ा जाए |
ये नाम है जीने मरने का,
बिना जिए ही मरने का,
और मरकर फिर से जीने का |

ये किसी बुद्धि की उपज नही,
जो हिचकोलों से डिग जाए |
ये आह्लादित मन का अंकुर है,
आँचल में जाने कब खिल जाये |

ये मिल जाये वो मिल जाये,
ये मर्म नहीं इस वेदन में |
जो तुम मुठी में छिपा रहे,
उसको बहने दो चेतन में |

अरनव की ये लहर बहेगी,
तल पर हर पल निश्चल मन में |
स्वफूटित हो फिर कली खिलेगी,
क्षितिज़ तलक हर कोने में |

जो तुम मुठी में छिपा रहे,
उसको बहने दो चेतन में |
अरनव की ये लहर बहेगी,
तल पर हर पल निश्चल मन में |



: आरोही अग्रवाल 

Wednesday, 5 February 2014

तेरे होने की ख़ुशी !!

दिन, तारीखें, बातें, यादें
भला कैसे याद ना रहे
हर ख़ास दिन तेरा तुझसे जुड़ा
भूलूं , कहो कैसे जो सब तुझमें गुंधा हो मेरा
कुछ आदत सी हैं इन आते-जाते
छोटे-छोटे लम्हों को समेटकर रखने की
उसी गोल-मटोल संदूक में
जिसके बस होने भर से
हर कोने में
वही महक बसा करती है
जो उभरी थी कली-सी खिलकर
उस रोज़ जब तुमने दस्तक दी थी
पहली बार मन में मेरे
लय भरी थी इस जीने में |

आज फिर जब हौले से हाथ फेरा
उन सहेजी हुई यादों पर
वही एहसास, वही ख़ुशी
जैसे कहीं झूम रही हो ये रूह
फूलों की बरखा में
झरोकों से गुजरती मद्धम सी रौशनी में
कहीं गुम हो जैसे  
भागती उड़ती मचलती हवा के झोकों- सी |

रात दर रात बीती बहुत
पर देखो ना ये महक
वैसे ही है आज भी
जैसी हुई करती थी
बरसों पहले |
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: आरोही अग्रवाल 

Saturday, 26 October 2013

रह जाते हैं कुछ सवाल !!


तेज़ तेज़ क़दमों से रास्ता पार करने की जद्दोजेहत,  सिर पर खड़ा सूरज वो तपतपाती धूप, दोनों पांव किसी हौड़ में भाग लेते हुए, मानो रास्ता चुटकियों में पार कर लेना चाहते हों I दूर दूर तक कोई पंछी भी नज़र न आये, हाय... ऐसी हालत थी गर्मी के कारण, उसपर ये सुनसान रास्ता I अपने ही ख्यालों में खोयी कहीं ... दिन भर जो अटपटा रहा सो रहा, उसपर अम्मा के नखरों से बड़ती बेफ़जूल की सिरदर्दी, कभी ये करो कभी न करो, इसी उधेड़बुन में पेड़ों से सटा रास्ता कब पार कर गयी पता ही न चला I अब अपने गाँव की मंडेर नज़र आने लगी थी, राहत की साँस ली मैंने I

ऐसे ही आते-जाते बुनते-उधड़ते विचारों के बीच किसी मद्धम सी रौशनी ने दस्तक दी हो जैसे ....कुछ दूरी पर किसी की बनती उभरती आकृति नजर आई I पास आते-आते उसका वो गहरे नीले रंग का सूट, थके मांदे से बड़ते कदम, और सिर पर लादी घास फूंस से भरी गठरी I गेंहुए रंग का झुर्रियों से भरा चेहरा और माथे पर पड़ते शिकन के बीच मेहनत मानो ओंस की बूँद जैसे चमक रही हो I उसकी थकान, उसका चेहरा और उसके शिथिल पड़ते पांव स्पष्ट ब्यान कर रहे थे I उसकी ऐसी हालत देखकर, अकस्मात ही ये ख्याल हो आया की भला इतना बोझा सिर पर लादने की ज़रूरत क्या है, कोई ठेला लेलेती तो कितना आसान हो जाता I ऐसा विचार भला आये भी क्यूँ न, हम चाहे अपनी कितनी इधर-उधर की बातों का बोझ हररोज़ ढोते फिरें, पर औरों को देख अपनी राय बनाने में कहाँ सकुचाते हैं, तब तो जैसे विद्वान पंडित हम स्वयं हों गये हों I

फिर तभी मेरे देखते ही देखते वो गठरी उसके सिर से लुढ़क गयी और थोड़ी दूर जाकर गिरी I उसने एक दो बार चेष्टा की उठाने की पर कर नही पाई I क्या पता अपनी सखी-सहेलियों से ही रखवाती हो चलने से पहले भी I मैं उसकी ओर देखती हुई निकलने की कोशिश कर रही थी, पर छोटे-छोटे कदम लेती जाने क्यूँ थम सी गयी वहीँ I  उसकी बड़ी-बड़ी काले घेरों से सटी आँखें एकटक कभी मुझे देखती तो कभी गठरी को ....जैसे कुछ कहना चाह रही हों I असहाय-सी न वो मुझे आवाज़ दे पाई और न मैं ही खुद कुछ पूछने की हिम्मत जुटा पायी.... बड़े-छोटे लोगों का भेद जो बना रखा है हमने I  इसी तरह दो कदम आगे ले लिये, पर न जाने क्यूँ एक बार पीछे मुडकर देखा, और पाया कि वो अब भी मुझे ही देख रही थी बड़ी आशा से I मैं बढ़ न सकी, वो वहीँ पीछे खड़ी हुई आवाज़ लगाते हुई पूछती, “मेमसाब जरा हाथ लगवा दो, ये गठरी उठाना आसान हो जायेगा I” मैं भी बिना कुछ सोचे- समझे मुड़ गयी उसकी ओर, जैसे उसकी पुकार की ही बाट जो रही थी I या यूँ कहूँ कि किसी दूर बसे एहम की पूर्ति हो गयी थी I मैंने जैसे ही नीचे गिरी गठरी को उठाने की कोशिश की, बाप रे कितनी भारी I कहने को घास फूस था उसमें, पर भार लोहे जैसा; ये अकेली भला इतनी दूर इसे सम्भालती कैसे होगी, भगवान जाने I मेरे लिए तो रोजमर्रा के काम ही सिरदर्द हो जाते हैं और ये अधेड़ उम्र की औरत....कितना मुश्किल है ताउम्र ऐसा जीवन जीना I एक रहीस आदमी जो पत्थर पड़े फ़र्श पर भी कालीन बिछा कर पाँव रखता है वो कितना छोटा समझता है इन्हें I पर सच है कितना अलग I

यही सब सोचते-सोचते..... मेरे थोड़ा-सा सहारा देने से उसने वो गठरी सिर पर उठा ली और मेरा शुक्रिया अदा कर अपने रस्ते चल पड़ी I मैं भी अपने गाँव की ओर कदम दर कदम बढाने लगी I पर आज उस अधेड़ उम्र की औरत से मिलकर ना जाने कितने सवाल मेरे ज़हन में तैरने लगे थे, जवाबों और अर्थों की प्रतीक्षा में I

- आरोही