Sunday, 4 August 2013

सौगात !!



ओ अलबेले !!
ये कैसी खट्टी-मीठी सी
झिलमिलाती बहती सी
तू सौगात दे गया I
 
कैसे शब्दों में सुरों को पिरोउं,
कैसे पन्नों पर भावों को उकेरूं,
प्यार से सीखा गया I

हर एक पंक्ति,
एक-एक ख्याल
जब मन के झरोंके से
पन्ने पर उतरते हैं,
मानो तू स्याही बन, रंगता हो
वो एक एक शब्द मेरा I

यूहीं हाथ पकड़ कर
कृति बनाना नई
अपने हमारे ख्वाबों की,
जगमगाते तारों की
रोशनी करेंगे यहाँ
जियेंगे प्रेम में
जो हो अरनव-सा असीम अथाह I

-“आरोही”

Friday, 2 August 2013

किसकी हार !!


देखा आज करीब से
एक बाप को उसकी नन्ही परी बेचते
चंद सिक्कों के लिए
चंद सांसों के लिए ,
चंद दिनों की रोटी के लिए
बहुत रोया वो
चंद  टुकड़ों की खातिर अपनी जान जो बेच दी
जैसे हार गया हो ज़िन्दगी से
I


पर अफ़सोस फिर और गहरा हुआ...जब देखा उस पिता को
जिसने बेचा अपने बेटे और बेटी को
मात्र अमीरी के शौंक को जिंदा रखने को
आह रे ...... ख़ुशी थी उसके चेहरे पर फिर भी
समझ नहीं पाई किसकी हार हुई और क्यूँ !!

- “आरोही”

सफ़र

सफ़र क्यूँ भाता है मुझे
ऐसे बैठे बैठे ,
चलते-चलते कुछ गुनगुनाती हूँ,
मैं अपने दिल कि कहानी तुम्हें सुनाती हूँ,
कहती हूँ अपनी ज़ुबानी, नया गीत गाती हूँ I
भाव आते हैं, खयाल आते हैं
झिलमिलाते हुए सुर सजाते हैं

हाँ सफ़र भाये जाता है मुझे I

- "आरोही"