ओ अलबेले !!
ये कैसी खट्टी-मीठी सी
झिलमिलाती बहती सी
तू सौगात दे गया I
कैसे शब्दों में सुरों को पिरोउं,
कैसे पन्नों पर भावों को उकेरूं,
प्यार से सीखा गया I
हर एक पंक्ति,
एक-एक ख्याल
जब मन के झरोंके से
पन्ने पर उतरते हैं,
मानो तू स्याही बन, रंगता हो
वो एक एक शब्द मेरा I
यूहीं हाथ पकड़ कर
कृति बनाना नई
अपने हमारे ख्वाबों की,
जगमगाते तारों की
रोशनी करेंगे यहाँ
जियेंगे प्रेम में
जो हो अरनव-सा असीम अथाह I
-“आरोही”