सफ़र क्यूँ भाता है मुझे
ऐसे बैठे बैठे ,
चलते-चलते कुछ गुनगुनाती हूँ,
मैं अपने दिल कि कहानी तुम्हें सुनाती हूँ,
कहती हूँ अपनी ज़ुबानी, नया गीत गाती हूँ I
भाव आते हैं, खयाल आते हैं
झिलमिलाते हुए सुर सजाते हैं
हाँ सफ़र भाये जाता है मुझे I
- "आरोही"
ऐसे बैठे बैठे ,
चलते-चलते कुछ गुनगुनाती हूँ,
मैं अपने दिल कि कहानी तुम्हें सुनाती हूँ,
कहती हूँ अपनी ज़ुबानी, नया गीत गाती हूँ I
भाव आते हैं, खयाल आते हैं
झिलमिलाते हुए सुर सजाते हैं
हाँ सफ़र भाये जाता है मुझे I
- "आरोही"
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