मुझे हर सुबह हर शाम देखो न, ये यहीं मिला
एक गहरे मटमैले रंग का कबूतर
गुमसुम-सा
अपने में ही खोया,
बस एक ही ओर अपलक देखते हुए
जैसे कुछ कहना चाह रहा हो ये I
एक ही पैर से पाइप को पकड़े,
बिना हिले-डुले,
जैसे किसी तप का प्रण लिया हो उसने I
पहले तो लगा जैसे निर्जीव है ये,
पर उसका वहीँ अडिग हो खड़े रहना
दिन के उसी पहर
उसी जगह
सवाल उठने लगे मन में
वो मूक प्राणी
और मैं बस कहने को एक इंसान, कैसे समझ पाती उसकी छुपी कहानी I
कहीं उसे भी किसी खोए हुए साथी का इंतज़ार तो नहीं,
जो अपलक उसी रास्ते को दिन के इसी पहर ढूँढ़ते हुए आ जाता है I
या कहीं उसके पुराने घोंसले कि कारस्तानी तो नहीं ये,
जिसकी खट्टी-मीठी यादें भी सताती हो आज उसे
जिन अपनों को कुछ बड़ा पाने के बहकावे में छोड़ आया हो कभी I
या फिर इस जग के छल कपट को देख
कहीं ये तो नहीं कह रहा मुझसे कि
तुम भी समझ लो इस सच को, अब
तो अच्छा I
या कहीं अकेलेपन में भी जीवन है,
ये तो नहीं दर्शा रहा I
समझ नहीं पाई,
पर उसे देख मेरा मन जिसमें गुंधा था,
वही सब समझने बूझने में लग गया हो जैसे I
अचम्भा तो तब हुआ
जब आज फिर मैंने उसे वहीँ पाया
उस आंधी तूफ़ान में,
मुसलाधार बरसात में,
तब भी बड़े सुकून से वहीँ खड़ा
अडिग, अविरल
किसी मंजिल को देखता
ख्याल आया फिर एक
कहीं ये भी मोहब्बत का कायल तो नहीं,
अक्सर इतनी शिद्दत से इबादत कुछ विरले ही करते हैं I
- “आरोही”
बहुत ही सारगर्भित रचना... :)
ReplyDeleteआपने मेरी छोटी छोटी कोशिशों को समय दिया ,,,,,, तहेदिल से शुक्रिया :)
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