कुछ अंजाम मुक्कमल हो जायें,
ये सोच मुहब्बत नही होती |
कुछ चाहे अनचाहे मिल जायें,
ये देख दरारें नही पड़ती |
दिल पत्थर सा शीश नहीं,
जो झुकते ही धड़ गिर जाए |
ये लौ है अमिट अविरल सी,
जो अंधियारी में भी डट जाए |
किन्ही शब्दों का जंजाल नहीं,
जिसमें पकड़ा छोड़ा जाए |
ये नाम है जीने मरने का,
बिना जिए ही मरने का,
और मरकर फिर से जीने का |
ये किसी बुद्धि की उपज नही,
जो हिचकोलों से डिग जाए |
ये आह्लादित मन का अंकुर है,
आँचल में जाने कब खिल जाये |
ये मिल जाये वो मिल जाये,
ये मर्म नहीं इस वेदन में |
जो तुम मुठी में छिपा रहे,
उसको बहने दो चेतन में |
अरनव की ये लहर बहेगी,
तल पर हर पल निश्चल मन में |
स्वफूटित हो फिर कली खिलेगी,
क्षितिज़ तलक हर कोने में |
जो तुम मुठी में छिपा रहे,
उसको बहने दो चेतन में |
अरनव की ये लहर बहेगी,
तल पर हर पल निश्चल मन में |
: आरोही अग्रवाल

शब्द दर शब्द चित्रण....क्या बात है .... !!!
ReplyDeleteशुक्रिया राहुल :)
ReplyDelete