Saturday, 8 February 2014

कुछ मेरी नज़र से !!



कुछ अंजाम मुक्कमल हो जायें,
ये सोच मुहब्बत नही होती |
कुछ चाहे अनचाहे मिल जायें,
ये देख दरारें नही पड़ती |

दिल पत्थर सा शीश नहीं,
जो झुकते ही धड़ गिर जाए |
ये लौ है अमिट अविरल सी,
जो अंधियारी में भी डट जाए |

किन्ही शब्दों का जंजाल नहीं,
जिसमें पकड़ा छोड़ा जाए |
ये नाम है जीने मरने का,
बिना जिए ही मरने का,
और मरकर फिर से जीने का |

ये किसी बुद्धि की उपज नही,
जो हिचकोलों से डिग जाए |
ये आह्लादित मन का अंकुर है,
आँचल में जाने कब खिल जाये |

ये मिल जाये वो मिल जाये,
ये मर्म नहीं इस वेदन में |
जो तुम मुठी में छिपा रहे,
उसको बहने दो चेतन में |

अरनव की ये लहर बहेगी,
तल पर हर पल निश्चल मन में |
स्वफूटित हो फिर कली खिलेगी,
क्षितिज़ तलक हर कोने में |

जो तुम मुठी में छिपा रहे,
उसको बहने दो चेतन में |
अरनव की ये लहर बहेगी,
तल पर हर पल निश्चल मन में |



: आरोही अग्रवाल 

2 comments:

  1. शब्द दर शब्द चित्रण....क्या बात है .... !!!

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  2. शुक्रिया राहुल :)

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