Tuesday, 26 March 2013

ये रंग किसके !!




ये रंग मेरे भी होते अगर 

कितना अच्छा होता ना ।

हल्का हल्का गुलाल , काश मेरे गालों को भी छेड़ता 

कमाल ही होता ना ।
पिचकारी से नन्हे हाथ मुझे भी भिगोते,
पानी से भरे गुबारे ले , मुझपर उढोलते।
गुंजिया बनाकर माँ मीठा खिलाती,
कंडिया डालकर मैं भी सबको दिखाती ।

ये रंग मेरे भी होते अगर 

कितना अच्छा होता ना ।

मेरा बचपन भी काश वैसा रंगीन होता, 

ये कल्पना ही नहीं, अगर सच कि तस्वीर होता ,
फिर मैं भी झूमती, रंगों को बिखेरती 
नाचती घुमती, खुशियों कि होली खेलती ।

ये रंग मेरे भी होते अगर 

कितना अच्छा होता ना ।

अभी इस कशमकश में ही थी , कि भीतर से आवाज़ आई

"वहां कहाँ बैठ गयी जाकर, ना काम की न धाम की कलमुहि-सी, इसे क्या तेरा बाप सम्भालेगा ।"









वाह रे किस्मत, इतने रंग भी बनाये,

पर क्यूँ मेरे लिए एक भी नहीं 
जवाब आया ही नहीं कहीं से...मेरे क्यूँ का...।


--- "आरोही"


एक सपना ऐसा भी देखा .. !!


एक सपना ऐसा भी देखा , कहने को जो एक सपना था |


आग देख जब चारों ओर, डरी सहमी सी भाग रही मैं  इधर-उधर
दबी फंसी सी , जब कराह रही थी थमीं वहां ,
घावों को संजोते-संजोते, जाऊं किस मंजिल की ओर

चेहरा दिखा तभी भोला सा, जाने वो था  क्या ढूंढ़ रहा
पल भर को देखा उसकी ओर, इस जग को भी देखा मैंने ,
फिर रुक कर , छुपा लिया उसको, जैसे अकेले कहाँ ये जायेगा
भूल गयी उस पल कि खुद भी तो यहाँ फंसी हुई
बस छुपा लिया उसको भी जैसे, अकेले कहाँ ये जाएगा

समझ न आए माझी कौन बनेगा, कौन किनारे लगाये हमें
कह रही हूँ जैसे उसको, मत जा, उस दारुण संसार



एक सपना ऐसा भी देखा, कहने को जो एक सपना था |



वो नटखट-सा कुछ अद्भुत-सा, अंगुली पकड़ ले गया वहां,
कहने लगा वो थी माया,ये है असली जग का आकार |

मैं ठगी हुई सी, गुमसुम सी बस देख रही
उस अनोखे को, और देखूं उस कृति को
जहां रुदन था, क्रुन्दन था, वहां भी क्या सुख हो सकता ?
जहाँ दगा है, जहाँ है आहें, क्या वहां भी प्रेम यूँ खिल सकता ?


देख रही थी ठगी हुई सी, यूँ गुमसुम सी, मैं अविरल सी,
फिर पकड़ लिया, मेरे मन को, उस गिरधर ने, गोपाल ने l

और हंसा वो, ज़ोरों से बोला
“ देखेगी तू जिसको...वही तुझे मैं दिखलाऊंगा ,
वहीँ तुझे ले जाऊंगा |"



तुमने देखा क्रुन्दन को, और परेशान गयी तू हो
भूल गई  क्या ?

सुख-दुःख , तो मेरी माया,
तू सींच रही यूहीं, इस गहरे डर को अपने, तो ऐसा मंजर आना ही था |


अब देख ज़रा मेरी नज़रों से, मेरे इस संसार को,
अब देख ज़रा सब अर्पण कर मुझको, मेरे इस पावन आकार को |
यहाँ घृणा नहीं, न आहें हैं, सिर्फ प्रेम ही प्रेम समाया  है |

तू चलना मेरे संग सीख ले, मुझको ही जी भर तू देख ले,
फिर प्रेम ही प्रेम नज़र आये!


मैं भी भर दूँ तेरे इस बंज़र मन को, मेरे प्रेम भरे उस गीत से,
फिर प्रेम ही प्रेम नज़र आए, मुझको ही जी भर तू देख ले |

ख़ुशी ऐसी मिली मुझे, झूमने लगी खुद में ही मैं,


जब ख्याल आया उस नटखट का, फिर पगली हो, ढूँढू उसे यहाँ-वहाँ

उसकी वो मीठी बंसी वो सुंदर हठीली बातें,कह पड़ी जैसे मुझसे फिर

‘प्रेम ही प्रेम नज़र आए, मुझको ही जी भर तू देखले |‘


अब नज़रें घुमाई तो पाया उसे ही,

पंछियों के चह्चाहने में, उस हवा, उस फसाने में |

फिर झूम उठा ये मन, जैसे मिला हो नया जीवन
जहाँ प्रेम ही प्रेम समाया है, एक जीवन, जहाँ प्रेम ही प्रेम समाया है |



एक सपना ऐसा भी देखा, कहने को जो एक सपना था |

तभी कहते, की सपने भी यदा-कदा यूँ आते हैं,
हमको खुद से अपनी पहचान कराते हैं |

सच है क्या? किस राह तुझे चलना है, ओ राही !
मंजिल, कहाँ है तेरी ? कहाँ? वो तेरी राह ताक रही |

बस प्रेम ही प्रेम तू करता चल,  वो संग तेरे ही आएगा |
तू नाम उसी का लेता चल, उसमे ही समा जायेगा |

एक सपना ऐसा भी देखा, कहने को जो एक सपना था |

"आरोही "

मेरा क्या कसूर !!


माँ का हर रूप अलबेला, माँ का प्यार बड़ा अनमोल,

तभी तो गोपाल जी दौड़े-दौड़े आयें, देख मैया के बनाये लड्डू गोल-गोल।

अँखियाँ तरसी मनवा तरसा तेरे आँचल को हर पल,

कह दे माँ मैं तेरी हूँ, मत कर बेटा-बेटा अब ।



मेरी माँ है तू , तेरी ख़ुशी अनोखी,

तेरी एक परछाई को तरसी हूँ मैं ।

तेरे आँचल की छाओं में चलना चाहूँ ,

तू खिलखिला तो जरा झूमुंगी मैं ।

"आरोही"

खामोश नज़रें !!


सच है फ़र्ज़ के आगे सपने भुला देते हैं कुछ लोग।

मैं आज फिर उन नज़रों से रूबरू हुई ,
ठहरा दर्द का समंदर, बहता सुकून भरा झरना ,
कुछ कहती, वो खामोश निगाहें,
क्या जगमगाहट थी, कैसा झटपटाना था ,
मगर वो कहना सुन पाए कौन, कैसा गरीब का फ़साना था।
सच है फ़र्ज़ के आगे सपने भुला देते हैं कुछ लोग।

कमी उनकी भी नहीं , जो लुटा दें ,सपनों के आगे अपनों की दुनिया
फिर भी कशमकश में रहता है संसार उनका ।

वो नमीं भरा आँचल, वो गहरा प्यार-सा दरिया ,
फिर क्यूँ लौट कर न आया, वैसा खुशियों भरा चेहरा।
सच है फ़र्ज़ के आगे सपने भुला देते हैं कुछ लोग।

कैसे पता ही न चला , बोल दी मुझी से वो ,
रुको, ठहरो, सुनो ज़रा,
जो वो कह ही न पाए, जो हम सुन ही न पाए,
कि फ़र्ज़ के आगे सपने भुला देते हैं कुछ लोग।

मैं आज फिर उन नज़रों से रूबरू हुई।

"आरोही"

सवाल जो पूछती थी खुद से ...


कभी एक सवाल पूछती थी खुद से,
    देखें हजारों हैं, जो साथ चलते हैं ,वादे करते हैं
पर जब हार जाएँ हम खुद से,तब साथ कोई देदे,
    ऐसा क्या कहीं होता है कोई... ?

कभी एक सवाल पूछती थी खुद से,
    झिलमिलाती पलकें, मुस्कुराता चेहरा संजोता है दर्द कई
कोई हाथ पकड़ कर भर दे उसे, हँसना भी सीखा दे ..
    ऐसा क्या कहीं होता है कोई...?

जब भूलें हम खुद से ही कुछ कहना...
    कोई कहने सुनने लगे हमीं से
ऐसा क्या कहीं सच में, होता है कोई...?

हँसी भी आती थी, निराशा भी होती थी

यूहीं परेशान सी जब पूछ रही थी ये खुद से
    तब माँ आई और, हाथ पकड़ कर उठा दिया
और कुछ पूछे-कहे बिना, प्यार से खिलाने लगी मुझे, एक एक निवाला
    आंसूं झलक पड़े, ख़ुशी के थे या गम के, कह नही पाई

....पर जवाब मिल गया उसका, जो पूछती थी मैं खुद से!!

"आरोही"


मैं हूँ एक उर्जा एक ज्योति एक नूर !!


ये तेरी खता, कि तूने जाना मुझे बस एक शरीर ही
मैं हूँ कुछ और... कुछ और... एक उर्जा एक ज्योति एक नूर ।

किसी के उपयोग की वस्तु नहीं, किसी की इच्छा नहीं
मैं हूँ बहती पवन... सब सिमटा है मुझमें ही ,

सोच... सोच हे मानव, उत्पन्न तू मुझसे ही ,
फिर कैसे मुझे ही मान लिया इतना बिखरा टूटा हुआ ।

ये तेरी खता , कि तूने जाना मुझे बस एक शरीर ही ,
मैं हूँ एक उर्जा एक ज्योति एक नूर ।

तेरे किसी परिचय की मोहताज़ नहीं , सब सिमटा है मुझमें ही ।
अपने चारों और नज़र तो दौड़ा जरा
मैं ही हूँ  तेरे घर-परिवार की नीव ,
माँ, बहिन, पत्नी, बेटी, बहु हर रूप में ।

आसान है मंदिर में बिठाकर आरती घुमाना,
कठिन तो है ग़मगीन चौराहे पर भी कलियाँ सवारना ।

थोड़ा सोच और समझ , इंसान तो बन पहले ।

ये तेरी खता , कि तूने जाना मुझे बस एक शरीर ही ,
मैं हूँ एक उर्जा एक ज्योति एक नूर ।

"आरोही "



कैसे ये यादें साथ रही ....!!


आज अपने नीमु पेड़ तले, जब टेक लगा कर यूँ बैठी,

        आँखों के आगे जैसे, एक नन्ही परी थी, खेल रही l

भाग रही वो तितली संग ही , फूलों संग थी झूम रही ,

        कुछ यादें जैसे, हो खींच रही , सुबकाती मुझे हँसाती सी l

जाने पल मीठे बचपन के , वो बीत गए, क्यूँ बीत गए

       कैसे ये यादें साथ रही, जीवन के हर उस कलरव की l

जाने पल मीठे बचपन के , वो बीत गए, क्यूँ बीत गए l



वो मिटटी की, चौड़ी मंडेर पे, अब चढ़े महीने हो गए l

       वो मंजी डाल, बैठी अम्मा से, छेड़ा-छाड़ी हम भूल गए l

वो घंटों बैठ, कम्बल में उसके, अटपटी कहानियाँ सुनना,

       फिर जी भर के, अपना वो, हँसते-हँसते सो जाना  l


जाने पल मीठे बचपन के , वो बीत गए, क्यूँ बीत गए  l

      कैसे ये यादें साथ रही, जीवन के हर उस कलरव की l

जाने पल मीठे बचपन के , वो बीत गए, क्यूँ बीत गए l



वो बालों को सहलाना तेरा , कान खींच डपट लगाना ,

    अब ओझिल सा हो गया क्यूँ ,वो तेरा प्यार से खिलाना l

चलती सिलाईयों के बीच , रोक-रोक आधा बुना स्वेटर, ओढ़-ओढ़ वो इठलाना l

पूरी होती टोपी के लिए हमारा वो लड़ते जाना l

    रंग-बिरंगी ऊन में खुद को उलझाना, फिर मुस्काना l



कहाँ गई वो बातें  बचपन की , उस मीठे मौसम की l

    तेरे आँचल की ओट तले अब सोना हम क्यूँ  छोड़ गए  l


जाने पल मीठे बचपन के , वो बीत गए, क्यूँ बीत गए l

    कैसे ये यादें साथ रही, जीवन के हर उस कलरव की

जाने पल मीठे बचपन के , वो बीत गए, क्यूँ बीत गए l


कैसे भूलूँ वो याद पुरानी, जहाँ गिरके उठना संभलना, यूँ खेल-खेल में सीखा हमने,

    जहाँ जीत को भी ,औरों की खातिर ,यूँ हार में बदलना सीखा हमने l

बैठी थी जब, खोयी हुई, यूँ गुमसुम सी, उन लम्हों में

    आया पथिक एक, मेरी ओर, कहता मैं भी, इसी पथ का तो राही हूँ  l


तुम क्यूँ बैठी, यहाँ ठहरी, यूँ रुकने में कुछ मर्म नहीं  l

    ले चलो संग इन लम्हों को, साथ चलें उस मंजिल पर l


जीवन तो बहती नदिया है, यूँ रुकने में कुछ मर्म नहीं l

    कैसे ये यादें साथ रही, जीवन के हर उस कलरव की ,

जाने पल मीठे बचपन के, वो बीत गए, क्यूँ बीत गए l

"आरोही"

कहा मेरे दिल ने ...



किसी पल कहा मेरे दिल ने, वो मूक प्राणी अच्छे,

किस तरह सब अच्छा बुरा समझ जाते, जाने से पहले वो सबके बन जाते ।

प्यार की भाषा सीखो, जरा उनसे, जो बिन कहे सब कह जाते ।



इन राहों पे, गुमसुम-सा मेरा दिल बहक गया क्यूँ

तेरी दुनिया तेरी माया, तेरी है ये काया

इंसान हूँ मैं, फिर भी  हूँ ऐसी क्यूँ



किसी  पल कहा मेरे दिल ने, वो मूक प्राणी अच्छे ।



ये फूल पत्ते चुप ही अच्छे,गुमसुम हैं पर मुस्कुराहट से खुशियाँ तो देते हैं

चाहे कितना भी सहना पड़े इनको, प्यारा-सा मुस्कुरा देते हैं

क्यूँ न सीखूं मैं कुछ इनसे, जानू मैं इनसे कैसे है जीना ,

फिर मुस्कुराती, नाचती गाती, जी लूँ खुलके ये जहाँ  ।



किसी  पल कहा मेरे दिल ने, वो मूक प्राणी अच्छे ।

" आरोही ''