Saturday, 26 October 2013

रह जाते हैं कुछ सवाल !!


तेज़ तेज़ क़दमों से रास्ता पार करने की जद्दोजेहत,  सिर पर खड़ा सूरज वो तपतपाती धूप, दोनों पांव किसी हौड़ में भाग लेते हुए, मानो रास्ता चुटकियों में पार कर लेना चाहते हों I दूर दूर तक कोई पंछी भी नज़र न आये, हाय... ऐसी हालत थी गर्मी के कारण, उसपर ये सुनसान रास्ता I अपने ही ख्यालों में खोयी कहीं ... दिन भर जो अटपटा रहा सो रहा, उसपर अम्मा के नखरों से बड़ती बेफ़जूल की सिरदर्दी, कभी ये करो कभी न करो, इसी उधेड़बुन में पेड़ों से सटा रास्ता कब पार कर गयी पता ही न चला I अब अपने गाँव की मंडेर नज़र आने लगी थी, राहत की साँस ली मैंने I

ऐसे ही आते-जाते बुनते-उधड़ते विचारों के बीच किसी मद्धम सी रौशनी ने दस्तक दी हो जैसे ....कुछ दूरी पर किसी की बनती उभरती आकृति नजर आई I पास आते-आते उसका वो गहरे नीले रंग का सूट, थके मांदे से बड़ते कदम, और सिर पर लादी घास फूंस से भरी गठरी I गेंहुए रंग का झुर्रियों से भरा चेहरा और माथे पर पड़ते शिकन के बीच मेहनत मानो ओंस की बूँद जैसे चमक रही हो I उसकी थकान, उसका चेहरा और उसके शिथिल पड़ते पांव स्पष्ट ब्यान कर रहे थे I उसकी ऐसी हालत देखकर, अकस्मात ही ये ख्याल हो आया की भला इतना बोझा सिर पर लादने की ज़रूरत क्या है, कोई ठेला लेलेती तो कितना आसान हो जाता I ऐसा विचार भला आये भी क्यूँ न, हम चाहे अपनी कितनी इधर-उधर की बातों का बोझ हररोज़ ढोते फिरें, पर औरों को देख अपनी राय बनाने में कहाँ सकुचाते हैं, तब तो जैसे विद्वान पंडित हम स्वयं हों गये हों I

फिर तभी मेरे देखते ही देखते वो गठरी उसके सिर से लुढ़क गयी और थोड़ी दूर जाकर गिरी I उसने एक दो बार चेष्टा की उठाने की पर कर नही पाई I क्या पता अपनी सखी-सहेलियों से ही रखवाती हो चलने से पहले भी I मैं उसकी ओर देखती हुई निकलने की कोशिश कर रही थी, पर छोटे-छोटे कदम लेती जाने क्यूँ थम सी गयी वहीँ I  उसकी बड़ी-बड़ी काले घेरों से सटी आँखें एकटक कभी मुझे देखती तो कभी गठरी को ....जैसे कुछ कहना चाह रही हों I असहाय-सी न वो मुझे आवाज़ दे पाई और न मैं ही खुद कुछ पूछने की हिम्मत जुटा पायी.... बड़े-छोटे लोगों का भेद जो बना रखा है हमने I  इसी तरह दो कदम आगे ले लिये, पर न जाने क्यूँ एक बार पीछे मुडकर देखा, और पाया कि वो अब भी मुझे ही देख रही थी बड़ी आशा से I मैं बढ़ न सकी, वो वहीँ पीछे खड़ी हुई आवाज़ लगाते हुई पूछती, “मेमसाब जरा हाथ लगवा दो, ये गठरी उठाना आसान हो जायेगा I” मैं भी बिना कुछ सोचे- समझे मुड़ गयी उसकी ओर, जैसे उसकी पुकार की ही बाट जो रही थी I या यूँ कहूँ कि किसी दूर बसे एहम की पूर्ति हो गयी थी I मैंने जैसे ही नीचे गिरी गठरी को उठाने की कोशिश की, बाप रे कितनी भारी I कहने को घास फूस था उसमें, पर भार लोहे जैसा; ये अकेली भला इतनी दूर इसे सम्भालती कैसे होगी, भगवान जाने I मेरे लिए तो रोजमर्रा के काम ही सिरदर्द हो जाते हैं और ये अधेड़ उम्र की औरत....कितना मुश्किल है ताउम्र ऐसा जीवन जीना I एक रहीस आदमी जो पत्थर पड़े फ़र्श पर भी कालीन बिछा कर पाँव रखता है वो कितना छोटा समझता है इन्हें I पर सच है कितना अलग I

यही सब सोचते-सोचते..... मेरे थोड़ा-सा सहारा देने से उसने वो गठरी सिर पर उठा ली और मेरा शुक्रिया अदा कर अपने रस्ते चल पड़ी I मैं भी अपने गाँव की ओर कदम दर कदम बढाने लगी I पर आज उस अधेड़ उम्र की औरत से मिलकर ना जाने कितने सवाल मेरे ज़हन में तैरने लगे थे, जवाबों और अर्थों की प्रतीक्षा में I

- आरोही 

Sunday, 4 August 2013

सौगात !!



ओ अलबेले !!
ये कैसी खट्टी-मीठी सी
झिलमिलाती बहती सी
तू सौगात दे गया I
 
कैसे शब्दों में सुरों को पिरोउं,
कैसे पन्नों पर भावों को उकेरूं,
प्यार से सीखा गया I

हर एक पंक्ति,
एक-एक ख्याल
जब मन के झरोंके से
पन्ने पर उतरते हैं,
मानो तू स्याही बन, रंगता हो
वो एक एक शब्द मेरा I

यूहीं हाथ पकड़ कर
कृति बनाना नई
अपने हमारे ख्वाबों की,
जगमगाते तारों की
रोशनी करेंगे यहाँ
जियेंगे प्रेम में
जो हो अरनव-सा असीम अथाह I

-“आरोही”

Friday, 2 August 2013

किसकी हार !!


देखा आज करीब से
एक बाप को उसकी नन्ही परी बेचते
चंद सिक्कों के लिए
चंद सांसों के लिए ,
चंद दिनों की रोटी के लिए
बहुत रोया वो
चंद  टुकड़ों की खातिर अपनी जान जो बेच दी
जैसे हार गया हो ज़िन्दगी से
I


पर अफ़सोस फिर और गहरा हुआ...जब देखा उस पिता को
जिसने बेचा अपने बेटे और बेटी को
मात्र अमीरी के शौंक को जिंदा रखने को
आह रे ...... ख़ुशी थी उसके चेहरे पर फिर भी
समझ नहीं पाई किसकी हार हुई और क्यूँ !!

- “आरोही”

सफ़र

सफ़र क्यूँ भाता है मुझे
ऐसे बैठे बैठे ,
चलते-चलते कुछ गुनगुनाती हूँ,
मैं अपने दिल कि कहानी तुम्हें सुनाती हूँ,
कहती हूँ अपनी ज़ुबानी, नया गीत गाती हूँ I
भाव आते हैं, खयाल आते हैं
झिलमिलाते हुए सुर सजाते हैं

हाँ सफ़र भाये जाता है मुझे I

- "आरोही"




Tuesday, 2 July 2013

अनकही दास्तान !!


मुझे हर सुबह हर शाम देखो न, ये यहीं मिला
एक गहरे मटमैले रंग का कबूतर
गुमसुम-सा
अपने में ही खोया,
बस एक ही ओर अपलक देखते हुए
जैसे कुछ कहना चाह रहा हो ये I

एक ही पैर से पाइप को पकड़े,
बिना हिले-डुले,
जैसे किसी तप का प्रण लिया हो उसने I

पहले तो लगा जैसे निर्जीव है ये,
पर उसका वहीँ अडिग हो खड़े रहना
दिन के उसी पहर
उसी जगह
सवाल उठने लगे मन में
वो मूक प्राणी
और मैं बस कहने को एक इंसान, कैसे समझ पाती उसकी छुपी कहानी I

कहीं उसे भी किसी खोए हुए साथी का इंतज़ार तो नहीं,
जो अपलक उसी रास्ते को दिन के इसी पहर ढूँढ़ते हुए आ जाता है I

या कहीं उसके पुराने घोंसले कि कारस्तानी तो नहीं ये,
जिसकी खट्टी-मीठी यादें भी सताती हो आज उसे
जिन अपनों को कुछ बड़ा पाने के बहकावे में छोड़ आया हो कभी I

या फिर इस जग के छल कपट को देख
कहीं ये तो नहीं कह रहा मुझसे कि
तुम भी समझ लो इस सच को, अब
तो अच्छा I

या कहीं अकेलेपन में भी जीवन है,
ये तो नहीं दर्शा रहा I

समझ नहीं पाई,
पर उसे देख मेरा मन जिसमें गुंधा था,
वही सब समझने बूझने में लग गया हो जैसे I

अचम्भा तो तब हुआ
जब आज फिर मैंने उसे वहीँ पाया
उस आंधी तूफ़ान में,
मुसलाधार बरसात में,
तब भी बड़े सुकून से वहीँ खड़ा
अडिग, अविरल
किसी मंजिल को देखता

ख्याल आया फिर एक
कहीं ये भी मोहब्बत का कायल तो नहीं,
अक्सर इतनी शिद्दत से इबादत कुछ विरले ही करते हैं I

- “आरोही”

Monday, 27 May 2013

तेरा आना... !!




तेरे आने का असर... तेरे आने की खबर
देख ज़रा... मुझसे क्या सब कह रही हैं...

ये हल्की-हल्की  पवन... क्यूँ मुझे मोहने  लगी|
बरसेंगे  बादल... देखो कलियाँ भी खिलने लगी|
कौन जाने क्या रुत छाये...अब बरसों बाद
क्यूँ ये मन गाने लगा है... इस तरह बरसों बाद 

तेरा इंतज़ार करती निगाहेंक्या और कैसे कहेंगी सब
वो लबों की ख़ामोशीतुम खुद ही समझ जाना।
अब तकदीर हमारीये कलम क्या लिखेगी
खुद रब् ने नवाज़ाअपनी रहमत से
ये साँसे क्या कहेंगीतुम खुद ही समझ जाना।

-''आरोही''

Monday, 20 May 2013

आजा रे !!



आजा साजना आजा
किसी दिवस किसी रैन,
ताकते तेरा रास्ताभीगे-भरे ये बावरे नैन 
कह दे बस कुछ पल का है और इंतज़ार,
फिर तरसे मन को होगा तेरा दीदार 

देख तो सहीकैसे ये मन पल-पल छले मुझे
हवा कि सरन-सरनतेरे आने कि आहट लगे मुझे 
कैसे पगली-सीहाँ पगली-सी हो गयी
तुझे सोच-सोच मैं तुझमें खो गयी,
बिन हुए भी तेरी ही हो गयी  

पत्तों कि ओट से दूर तक झांकती,
दौड़े-दौड़े मौड़ तक पत्थरों पर भागती 
पर क्षितिज तक उड़ती धूल भी
,
मानो गुमसुम हैकैसे मुझे ही ताकती

यूँ पल बीते जा रहेये दिन बीते जा रहे,
क्यूँ ख़बर नहीं तेरी कोईअब ये नैना सूखे जा रहे
आजा साजना आजाकिसी दिवस किसी रैन,
ताकते तेरा रास्ताभीगे भरे ये बावरे नैन 















तू मस्त गगन का पंछी रे,
अब ऊँचे-ऊँचे उड़ता फिरे
मैं हूँ तेरी बावरी
ठहरी यहीं,
इस नदिया तीर   

आजा साजना आजाकिसी दिवस किसी रैन,
ताकते तेरा रास्ताभीगे-भरे ये बावरे नैन 
कह दे बस कुछ पल का है और इंतज़ार,
फिर तरसे मन को होगा तेरा दीदार 


-"आरोही "



Monday, 29 April 2013

रहना साथ मेरे !!




कोई सपना है या हकीक़त
समझी नहीं अब तक,
प्यार का मौसम है तो सुहाना,
पर आज क्यूँ लगा ये बेमाना।

कली खिली थी जो मद्धम सी रोशिनी में,
थोड़ा सहम गयी वो तपाती धूप में
जलना तपना कब आसान हुआ भला,
तेरे होने ना होने में भीकैसे मुझे आराम ही मिला।  

कहने लगी मुझसे येअपना हौंसला न छोड़ो
सांसो कि लौ से हवाओं का रुख मोड़ो।

अक्सर इस राह पर
कांटे लिखे हैं आने
हाथ थामे रखनाकिस पल कमजोर पड़ जाऊंकौन जाने।
फिर भी मंजिल मिल ही जाएगीतुम जो हो साथ मेरे,
दुआ है पूरे हों सब सपने तेरे-मेरे, हमारे।



- आरोही
 

सुबह मेरी !!

     

घर की सुबह थी कितनी सुहानी,
बहुत याद आती है पुरानी कहानी। 

माँ का आते ही आवाज़ लगाना,
और हमारा मुहँ-कान ढक कर सो जाना। 
फिर वो धीरे से पकड़ती थी कान हमारे,
और हम कहते कि माँ , थोड़ा और सोने दो ना। 

देखो वो है सोया , उसको पहले जगाओ, 
यूँ कह कहकर करते बहाना,
फिर आधी आँखें खोल करते हम जागने का दिखावा। 

“जो जागेगा पहले , मिलेगी उसको प्रशाद कि बर्फी” , माँ कहती ऐसा,
और छलांग लगाकर दोनों का जग जाना, 
मुझे पहले मुझे पहले , मुझे कम... क्यूँ उसे ज्यादा ....
माँ कि ट्रिक हमेशा चल जाती थी,
मेरी हर सुबह ऐसे ही खिलती थी।

अब वो मौसम ही कहाँ, 
इस नयी जगह, नये जहाँ,
सब बदल गया जैसे, 
ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग....अब फ़ोन का अलार्म उठाता है ऐसे। 


- आरोही 


Tuesday, 26 March 2013

ये रंग किसके !!




ये रंग मेरे भी होते अगर 

कितना अच्छा होता ना ।

हल्का हल्का गुलाल , काश मेरे गालों को भी छेड़ता 

कमाल ही होता ना ।
पिचकारी से नन्हे हाथ मुझे भी भिगोते,
पानी से भरे गुबारे ले , मुझपर उढोलते।
गुंजिया बनाकर माँ मीठा खिलाती,
कंडिया डालकर मैं भी सबको दिखाती ।

ये रंग मेरे भी होते अगर 

कितना अच्छा होता ना ।

मेरा बचपन भी काश वैसा रंगीन होता, 

ये कल्पना ही नहीं, अगर सच कि तस्वीर होता ,
फिर मैं भी झूमती, रंगों को बिखेरती 
नाचती घुमती, खुशियों कि होली खेलती ।

ये रंग मेरे भी होते अगर 

कितना अच्छा होता ना ।

अभी इस कशमकश में ही थी , कि भीतर से आवाज़ आई

"वहां कहाँ बैठ गयी जाकर, ना काम की न धाम की कलमुहि-सी, इसे क्या तेरा बाप सम्भालेगा ।"









वाह रे किस्मत, इतने रंग भी बनाये,

पर क्यूँ मेरे लिए एक भी नहीं 
जवाब आया ही नहीं कहीं से...मेरे क्यूँ का...।


--- "आरोही"


एक सपना ऐसा भी देखा .. !!


एक सपना ऐसा भी देखा , कहने को जो एक सपना था |


आग देख जब चारों ओर, डरी सहमी सी भाग रही मैं  इधर-उधर
दबी फंसी सी , जब कराह रही थी थमीं वहां ,
घावों को संजोते-संजोते, जाऊं किस मंजिल की ओर

चेहरा दिखा तभी भोला सा, जाने वो था  क्या ढूंढ़ रहा
पल भर को देखा उसकी ओर, इस जग को भी देखा मैंने ,
फिर रुक कर , छुपा लिया उसको, जैसे अकेले कहाँ ये जायेगा
भूल गयी उस पल कि खुद भी तो यहाँ फंसी हुई
बस छुपा लिया उसको भी जैसे, अकेले कहाँ ये जाएगा

समझ न आए माझी कौन बनेगा, कौन किनारे लगाये हमें
कह रही हूँ जैसे उसको, मत जा, उस दारुण संसार



एक सपना ऐसा भी देखा, कहने को जो एक सपना था |



वो नटखट-सा कुछ अद्भुत-सा, अंगुली पकड़ ले गया वहां,
कहने लगा वो थी माया,ये है असली जग का आकार |

मैं ठगी हुई सी, गुमसुम सी बस देख रही
उस अनोखे को, और देखूं उस कृति को
जहां रुदन था, क्रुन्दन था, वहां भी क्या सुख हो सकता ?
जहाँ दगा है, जहाँ है आहें, क्या वहां भी प्रेम यूँ खिल सकता ?


देख रही थी ठगी हुई सी, यूँ गुमसुम सी, मैं अविरल सी,
फिर पकड़ लिया, मेरे मन को, उस गिरधर ने, गोपाल ने l

और हंसा वो, ज़ोरों से बोला
“ देखेगी तू जिसको...वही तुझे मैं दिखलाऊंगा ,
वहीँ तुझे ले जाऊंगा |"



तुमने देखा क्रुन्दन को, और परेशान गयी तू हो
भूल गई  क्या ?

सुख-दुःख , तो मेरी माया,
तू सींच रही यूहीं, इस गहरे डर को अपने, तो ऐसा मंजर आना ही था |


अब देख ज़रा मेरी नज़रों से, मेरे इस संसार को,
अब देख ज़रा सब अर्पण कर मुझको, मेरे इस पावन आकार को |
यहाँ घृणा नहीं, न आहें हैं, सिर्फ प्रेम ही प्रेम समाया  है |

तू चलना मेरे संग सीख ले, मुझको ही जी भर तू देख ले,
फिर प्रेम ही प्रेम नज़र आये!


मैं भी भर दूँ तेरे इस बंज़र मन को, मेरे प्रेम भरे उस गीत से,
फिर प्रेम ही प्रेम नज़र आए, मुझको ही जी भर तू देख ले |

ख़ुशी ऐसी मिली मुझे, झूमने लगी खुद में ही मैं,


जब ख्याल आया उस नटखट का, फिर पगली हो, ढूँढू उसे यहाँ-वहाँ

उसकी वो मीठी बंसी वो सुंदर हठीली बातें,कह पड़ी जैसे मुझसे फिर

‘प्रेम ही प्रेम नज़र आए, मुझको ही जी भर तू देखले |‘


अब नज़रें घुमाई तो पाया उसे ही,

पंछियों के चह्चाहने में, उस हवा, उस फसाने में |

फिर झूम उठा ये मन, जैसे मिला हो नया जीवन
जहाँ प्रेम ही प्रेम समाया है, एक जीवन, जहाँ प्रेम ही प्रेम समाया है |



एक सपना ऐसा भी देखा, कहने को जो एक सपना था |

तभी कहते, की सपने भी यदा-कदा यूँ आते हैं,
हमको खुद से अपनी पहचान कराते हैं |

सच है क्या? किस राह तुझे चलना है, ओ राही !
मंजिल, कहाँ है तेरी ? कहाँ? वो तेरी राह ताक रही |

बस प्रेम ही प्रेम तू करता चल,  वो संग तेरे ही आएगा |
तू नाम उसी का लेता चल, उसमे ही समा जायेगा |

एक सपना ऐसा भी देखा, कहने को जो एक सपना था |

"आरोही "

मेरा क्या कसूर !!


माँ का हर रूप अलबेला, माँ का प्यार बड़ा अनमोल,

तभी तो गोपाल जी दौड़े-दौड़े आयें, देख मैया के बनाये लड्डू गोल-गोल।

अँखियाँ तरसी मनवा तरसा तेरे आँचल को हर पल,

कह दे माँ मैं तेरी हूँ, मत कर बेटा-बेटा अब ।



मेरी माँ है तू , तेरी ख़ुशी अनोखी,

तेरी एक परछाई को तरसी हूँ मैं ।

तेरे आँचल की छाओं में चलना चाहूँ ,

तू खिलखिला तो जरा झूमुंगी मैं ।

"आरोही"

खामोश नज़रें !!


सच है फ़र्ज़ के आगे सपने भुला देते हैं कुछ लोग।

मैं आज फिर उन नज़रों से रूबरू हुई ,
ठहरा दर्द का समंदर, बहता सुकून भरा झरना ,
कुछ कहती, वो खामोश निगाहें,
क्या जगमगाहट थी, कैसा झटपटाना था ,
मगर वो कहना सुन पाए कौन, कैसा गरीब का फ़साना था।
सच है फ़र्ज़ के आगे सपने भुला देते हैं कुछ लोग।

कमी उनकी भी नहीं , जो लुटा दें ,सपनों के आगे अपनों की दुनिया
फिर भी कशमकश में रहता है संसार उनका ।

वो नमीं भरा आँचल, वो गहरा प्यार-सा दरिया ,
फिर क्यूँ लौट कर न आया, वैसा खुशियों भरा चेहरा।
सच है फ़र्ज़ के आगे सपने भुला देते हैं कुछ लोग।

कैसे पता ही न चला , बोल दी मुझी से वो ,
रुको, ठहरो, सुनो ज़रा,
जो वो कह ही न पाए, जो हम सुन ही न पाए,
कि फ़र्ज़ के आगे सपने भुला देते हैं कुछ लोग।

मैं आज फिर उन नज़रों से रूबरू हुई।

"आरोही"

सवाल जो पूछती थी खुद से ...


कभी एक सवाल पूछती थी खुद से,
    देखें हजारों हैं, जो साथ चलते हैं ,वादे करते हैं
पर जब हार जाएँ हम खुद से,तब साथ कोई देदे,
    ऐसा क्या कहीं होता है कोई... ?

कभी एक सवाल पूछती थी खुद से,
    झिलमिलाती पलकें, मुस्कुराता चेहरा संजोता है दर्द कई
कोई हाथ पकड़ कर भर दे उसे, हँसना भी सीखा दे ..
    ऐसा क्या कहीं होता है कोई...?

जब भूलें हम खुद से ही कुछ कहना...
    कोई कहने सुनने लगे हमीं से
ऐसा क्या कहीं सच में, होता है कोई...?

हँसी भी आती थी, निराशा भी होती थी

यूहीं परेशान सी जब पूछ रही थी ये खुद से
    तब माँ आई और, हाथ पकड़ कर उठा दिया
और कुछ पूछे-कहे बिना, प्यार से खिलाने लगी मुझे, एक एक निवाला
    आंसूं झलक पड़े, ख़ुशी के थे या गम के, कह नही पाई

....पर जवाब मिल गया उसका, जो पूछती थी मैं खुद से!!

"आरोही"


मैं हूँ एक उर्जा एक ज्योति एक नूर !!


ये तेरी खता, कि तूने जाना मुझे बस एक शरीर ही
मैं हूँ कुछ और... कुछ और... एक उर्जा एक ज्योति एक नूर ।

किसी के उपयोग की वस्तु नहीं, किसी की इच्छा नहीं
मैं हूँ बहती पवन... सब सिमटा है मुझमें ही ,

सोच... सोच हे मानव, उत्पन्न तू मुझसे ही ,
फिर कैसे मुझे ही मान लिया इतना बिखरा टूटा हुआ ।

ये तेरी खता , कि तूने जाना मुझे बस एक शरीर ही ,
मैं हूँ एक उर्जा एक ज्योति एक नूर ।

तेरे किसी परिचय की मोहताज़ नहीं , सब सिमटा है मुझमें ही ।
अपने चारों और नज़र तो दौड़ा जरा
मैं ही हूँ  तेरे घर-परिवार की नीव ,
माँ, बहिन, पत्नी, बेटी, बहु हर रूप में ।

आसान है मंदिर में बिठाकर आरती घुमाना,
कठिन तो है ग़मगीन चौराहे पर भी कलियाँ सवारना ।

थोड़ा सोच और समझ , इंसान तो बन पहले ।

ये तेरी खता , कि तूने जाना मुझे बस एक शरीर ही ,
मैं हूँ एक उर्जा एक ज्योति एक नूर ।

"आरोही "



कैसे ये यादें साथ रही ....!!


आज अपने नीमु पेड़ तले, जब टेक लगा कर यूँ बैठी,

        आँखों के आगे जैसे, एक नन्ही परी थी, खेल रही l

भाग रही वो तितली संग ही , फूलों संग थी झूम रही ,

        कुछ यादें जैसे, हो खींच रही , सुबकाती मुझे हँसाती सी l

जाने पल मीठे बचपन के , वो बीत गए, क्यूँ बीत गए

       कैसे ये यादें साथ रही, जीवन के हर उस कलरव की l

जाने पल मीठे बचपन के , वो बीत गए, क्यूँ बीत गए l



वो मिटटी की, चौड़ी मंडेर पे, अब चढ़े महीने हो गए l

       वो मंजी डाल, बैठी अम्मा से, छेड़ा-छाड़ी हम भूल गए l

वो घंटों बैठ, कम्बल में उसके, अटपटी कहानियाँ सुनना,

       फिर जी भर के, अपना वो, हँसते-हँसते सो जाना  l


जाने पल मीठे बचपन के , वो बीत गए, क्यूँ बीत गए  l

      कैसे ये यादें साथ रही, जीवन के हर उस कलरव की l

जाने पल मीठे बचपन के , वो बीत गए, क्यूँ बीत गए l



वो बालों को सहलाना तेरा , कान खींच डपट लगाना ,

    अब ओझिल सा हो गया क्यूँ ,वो तेरा प्यार से खिलाना l

चलती सिलाईयों के बीच , रोक-रोक आधा बुना स्वेटर, ओढ़-ओढ़ वो इठलाना l

पूरी होती टोपी के लिए हमारा वो लड़ते जाना l

    रंग-बिरंगी ऊन में खुद को उलझाना, फिर मुस्काना l



कहाँ गई वो बातें  बचपन की , उस मीठे मौसम की l

    तेरे आँचल की ओट तले अब सोना हम क्यूँ  छोड़ गए  l


जाने पल मीठे बचपन के , वो बीत गए, क्यूँ बीत गए l

    कैसे ये यादें साथ रही, जीवन के हर उस कलरव की

जाने पल मीठे बचपन के , वो बीत गए, क्यूँ बीत गए l


कैसे भूलूँ वो याद पुरानी, जहाँ गिरके उठना संभलना, यूँ खेल-खेल में सीखा हमने,

    जहाँ जीत को भी ,औरों की खातिर ,यूँ हार में बदलना सीखा हमने l

बैठी थी जब, खोयी हुई, यूँ गुमसुम सी, उन लम्हों में

    आया पथिक एक, मेरी ओर, कहता मैं भी, इसी पथ का तो राही हूँ  l


तुम क्यूँ बैठी, यहाँ ठहरी, यूँ रुकने में कुछ मर्म नहीं  l

    ले चलो संग इन लम्हों को, साथ चलें उस मंजिल पर l


जीवन तो बहती नदिया है, यूँ रुकने में कुछ मर्म नहीं l

    कैसे ये यादें साथ रही, जीवन के हर उस कलरव की ,

जाने पल मीठे बचपन के, वो बीत गए, क्यूँ बीत गए l

"आरोही"

कहा मेरे दिल ने ...



किसी पल कहा मेरे दिल ने, वो मूक प्राणी अच्छे,

किस तरह सब अच्छा बुरा समझ जाते, जाने से पहले वो सबके बन जाते ।

प्यार की भाषा सीखो, जरा उनसे, जो बिन कहे सब कह जाते ।



इन राहों पे, गुमसुम-सा मेरा दिल बहक गया क्यूँ

तेरी दुनिया तेरी माया, तेरी है ये काया

इंसान हूँ मैं, फिर भी  हूँ ऐसी क्यूँ



किसी  पल कहा मेरे दिल ने, वो मूक प्राणी अच्छे ।



ये फूल पत्ते चुप ही अच्छे,गुमसुम हैं पर मुस्कुराहट से खुशियाँ तो देते हैं

चाहे कितना भी सहना पड़े इनको, प्यारा-सा मुस्कुरा देते हैं

क्यूँ न सीखूं मैं कुछ इनसे, जानू मैं इनसे कैसे है जीना ,

फिर मुस्कुराती, नाचती गाती, जी लूँ खुलके ये जहाँ  ।



किसी  पल कहा मेरे दिल ने, वो मूक प्राणी अच्छे ।

" आरोही ''